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बातें जो रह गई याद

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दीपक जोशी DEEPAK JOSHI


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हमारी परंपराएं

Posted On: 2 Nov, 2010  
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बिन फेरे हम तेरे…..

Posted On: 25 Oct, 2010  
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भविष्‍यफल

Posted On: 12 Oct, 2010  
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विषय की खोज……..

Posted On: 3 Oct, 2010  
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दायरा ……….

Posted On: 28 Sep, 2010  
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हाय हैलो………….

Posted On: 12 Sep, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

प्रिय श्री दीपक जोशी जी, आपके मन में कौंध रहे प्रश्‍न का उत्तर केवल हमारी लालफीताशाही और नौकरशाही है। जहां बैठे लोग किसी भी तरह के निर्णय के लिए भले ही अयोग्‍य हो लेकिन वे स्‍वयं को सबसे बड़ा तीसमारखां समझते हैं। किसी के मन भी ये भाव नहीं होता कि कोई कितना महान है। यदि वे किसी से उपकृत है तो उसका साधारण सा कार्य भी उनके लिए महानतम होता है। इसके लिए आप हमारी पदमश्री, पदमभूषण व भारत रत्‍न जैसे पुरस्‍कारों की सूची देख सकते हैं। जिससे अभी भी अनेक ऐसे नाम है जिनसे महान कार्य करने वाले को कोई पुरस्‍कार आज तक नहीं मिला है। खैर इस कलयुग के बह्मा को हम केवल अपना सलाम व मन से सम्‍मान ही दे सकते हैं। और कुछ नहीं......... अरविन्‍द पारीक

के द्वारा:

प्रिय अरविंद जी, देखा आप ने भूलने के कारण भूल से आप की प्रतिक्रिया का जवाब अधूरा ही छोड़ दिया। आप का प्रश्‍न सही है - यह वाकई में एक बीमारी ही है जिसे मनोचिकित्‍सक ने अपने आधार पर नाम दे दिया है। असल में यह लक्षण मेरे एक मित्र के पिता जी को हुए और वह कुछ अधिक ही परेशान थे तो उन्‍हे डॉक्‍टर को दिखाया गया। जिस ने इस बिमारी के विषय में विस्‍तार से जानकारी दी, आप ब्‍लॉगरों को तो मैने इस के रोचक पहलू से ही अवगत करवाया है किन्‍तु उन के पिता जी का मर्ज कुछ इस कदर बढ गया था कि वह एक बार खाना खाने के बाद कुछ देर पश्‍चात भूल जाते थे एवं पुन; खाना मांग लेते थे। और यह मजाक नही है पर हां यह सत्‍य है कि यह एक बीमारी है और यह मनोरोग से संबध रखती है।

के द्वारा:

स्नेही दीपक जी, काफी दिनों बाद आपके दर्शन हुए वो भी एक ऐसी समस्या के साथ जिसे डाक्टर तो समस्या कह सकते हैं लेकिन मुझे इस कमी को कुशलता कहने में कोई परहेज़ नहीं| आप मेरा उदहारण ले सकते हैं| मैं बहुत ही कम चीज़ें भूलता हूँ और मुझे इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है| किसी कवि ने लिखा है "आदमी हो जाए दीवाना, याद करे गर भूल न जाए" यानी याद रखने से भूलना ज्यादा अच्छा है| प्रख्यात निबंधकार रॉबर्ट लिंड का कहना है "Forgetting seems to me all but a virtue of human memory because a forgetful man is often a man who is making the best of life." महान आधुनिक विचारक श्री हिमेश रेशमिया जी भी न भूल पाने का अपना दुःख कुछ इस तरह से व्यक्त करते है "तुझे भूल जाना-जाना मुमकिन नहीं, तू याद न आये ऐसा कोई दिन नहीं !" और फिर उनकी भी आँखों में आंसू आया जाते है| आपकी याददाश्त तो माशाल्लाह काफी अच्छी है देखिये आप हमें भूल नहीं पाए| Don't worry, be happy! हम साथ साथ हैं| :)

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

प्रिय राजकमल जी प्रणाम, सलाह तो आप ने सही हि दि है किन्‍तु आज के इन बच्‍चों में इतनी एकाग्रता ही कहा है। दस मिनट से अधिक एक चैनल पर उन की नजर नही टिकती है। मेरी बेटी को तो मात्र कार्टून नेटवर्क या सब टी.वी; के सीरियल ज्‍यादा पसंद है। और अगर दूसरी बेटी भी साथ में बैठ कर टी.वी; देखना चाहती है तो फिर रिमोट लेने के लिए आपस में झगड़े होते है। इस कारण मैने अपने बैडरूम में अपने लिए एक अलग टी.वी; लगा रखा है। कहते हैं संस्‍कार तो परिवार में रह कर ही प्राप्‍त होते है किन्‍तु कुछ हद तक वह समाज की धारा से भी जुड़े होते है और सामाजिक धारा को बहाव इतना तेज होता है कि न चाहते हुए भी हमें उस के साथ बहना ही पड़ता है। एक अच्‍छी प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

दीपक भाई सर्वप्रथम आपको दीपावली की ढेर सारी बधाइयां व शुभकामनाएं । आपने नई पीढ़ी, खास कर आजके बच्चों के दिमाग में हमारे त्योहारों की रूपरेखा के विषय में जो इमेज है, उसका बखूबी वर्णन किया है । यह सही है कि ग्रामीण और कस्बाई भारत में आज भी त्योहारों की पुरानी झलक देखने को मिलती है, परन्तु पुराने दिनों के अनुभवों के आधार पर यही कहा जाएगा कि वहां भी झलक भर ही बाक़ी है । कम से कम त्योहारों के पीछे की पवित्र और स्वाभाविक उल्लासमयी भावनाओं का तो लोप होता ही जा रहा है । एक परम्परा का निर्वहन भर हो रहा है, चाहे होली हो, दीवाली हो, या दशहरा । होली अब उल्लसमयी हुड़दंग की बजाय आक्रामक हुड़दंग में बदल गई है । नई पीढ़ी की संस्कारविहीनता के कारण लोग उनसे बचकर निकलना पसंद करते हैं । भंग की तरंग वाली सात्विकता की जगह शराब के भभके ने ले लिया । खानपान भी बदल चुका है । दीपावली महंगे पटाखों पर पैसे के अपव्यय, प्रदर्शन और जुआरियों की शगल में बदल चुकी है तथा दशहरे का तो दिल्ली को छोड़कर दूसरे महानगरों में पता ही नहीं चलता । बच्चों को हम सुरक्षा कारणों से खुद सिमटकर जीने को बाध्य कर चुके हैं, तो उन्हें यदि त्योहारों के विषय में कुछ नहीं पता तो इसमें उनका कोई दोष भी नहीं है । हमें बच्चों के प्रति अदृश्य आतंकवादियों, हमारे निजी शत्रुओं तथा अज्ञात अपहरणकर्त्ताओं का भय हमेशा सताता रहता है । आजका माहौल ही ऐसा है । साधुवाद ।

के द्वारा:

समता जी, अधिक तो मै भी नही जानता पर इसी ब्‍लॉग पर एक ब्‍लॉगर है, श्रध्‍येय श्री के.एम.मिश्रा जी, जो पेशे से एक वकील भी है। उन्‍होंने हमारी (मेरे और अन्‍य ब्‍लागरस) की जानकारी के लिए बताया है कि - आदरणीय जोशी जी आपको और दूसरों को जानकर बड़ी हैरानी होगी कि कानून और अदालतें नैतिकता को कानून के दायरे में नहीं मानती हैं इसीलिये लिव इन रिलेशन शिप और होमोसेक्सुएलटी जैसे मामलों पर अदालतों की राय भिन्न होती है । तो समता जी बात यहां आती है हम या आप तो सामाजिक पहलू पर इस तरह बात कर रहें है जैसे कि सब्‍जी मार्किट में मिल गए। और लगे बतियाने। सब के पिछे कानून भी तो है आखिर। अच्‍छी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

दीपक जी मेरे ख्याल से कानून बने या बने.. ये सही है ये गलत है ...... बात ये मायने रखती है की औरते इसे किस तरह स्वीकारती है ... क्या वोह इस को लेकर खुशी होती होगी.. नहीं वोह सोचती होगी की उन्हें भी आधुनिक हो जाना चहिये क्युकी भाई ये तो कानून है ........ सबसे पहले तो इस कानून की जरुरत ही क्या थी? ये समझ नहीं आता .... और महिला जो बिन फेरे हम तेरे में विश्वास रखती है बहुत ही काम होगी या न के बराबर होगी.......... और जो ४-५ होगी वोह भी कभी न कभी पछताती ही है .. क्युकी एक समय बाद तो पुरुष दूसरी शादी कर लेगा मगर वोह महिला न घर की रहती है न घाट की......... इस कानून को मान्यता देने से तो अच्छा था जो लोग इस तरह साथ रहे उन्हें सजा दी जाये........ शादी की .........

के द्वारा: roshni roshni

जोशी जी अभिवादन स्वीकार करे .... यह विषय लगभग हर मंच पर उठ चूका है लेकिन समय के साथ जैसे आपके मित्र ने हाथ खड़े कर दिए है सभी ने वही करना होगा क्योकि परिवर्तन की अपेक्षा हम केवल दुसरो से रखते है .खुद माँ बाप ही बच्चो को पश्चिमी कुए में धकेलकर आत्ममुग्ध बने फिरते है और बच्चे जब ऐसे कदम उठाते है तो वह उसी भौतिक भूख की उनके अनुसार पराकाष्ठ होती है जिसके बीज बचपन में ही पड़ चुके थे .... अब अगर हम बच्चो को राम की जगह टॉम बनने की शिक्षा देंगे तो परिणाम तो यही होगा.... हा जहा तक परिणाम की बात आपने कही है तो ..इसका परिणाम एक जबरदस्त अराजक समाज और अवसाद ग्रस्त मानवता के रूप में आएगा... ..क्योकि आंकड़े बताते है की जो अमेरिका आज मानवीय संबंधो में खुलेपन के बारे में सबसे आगे है वह महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधो में भी सबसे आगे है .... ड्रग्स , हथियार ,, वैश्यावृति .इत्यादि में सबसे आगे ये देश सबसे खुलेपन का नाटक दिखाते है ... वे अपना अवसादी भूखा व्यवहार हमें ऐसे खुबसूरत कवर में लपेट कर दिखाते है जो हमें बहुत आकर्षित करता है ...और उसी के अंधे अनुयायी बनकर हम अपने को तबाह करते जा रहे है ..... आगे सिर्फ ... अराजकता .. मानवीय संबंधो से भावना का स्थान भूख ले लेगी ...

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

स्नेही दीपक जी, काफी दिनों बाद आपकी पोस्ट आई लेकिन एक सही मुद्दे को सही तरीके से उठाया है आपने| आपकी चिंता सही है और आपकी निराशा भी जायज है| लिव-इन-रिलेशन की आवश्यकता हमारे समाज को कभी भी नहीं थी न आज है| ये आवश्यकता है आज के नवधनाड्य वर्ग की और नौकरशाहों की जिन्हें अपनी कुत्सित वासनाओं को पूरा करने में जब बाधा नज़र आई तो ये नया कानून सामने ले आये जिससे ये स्त्री वर्ग का मनमाना शोषण कर सकें| अभी तक रेप जैसे मामलों में ८० से ९० प्रतिशत मामलों का निपटारा पीडिता को धन और बल से धमका के लोग बच जाते थे लेकिन फिर भी १० से २० प्रतिशत लोगों को सजा मिल जाती थी परन्तु अब इस क़ानून के सहारे १०० फीसदी अपराधी बाइज्ज़त समाज में घूमेंगे और नए शिकार की तलाश करेंगे| कम से कम मुझे तो इस क़ानून के पीछे यही नज़र आ रहा हैं| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा:

आदरनीय जोशी जी सादर प्रणाम,आपका यह ज्योतिष के ऊपर अति सुन्दर लेख और उसके साथ ही आदरनीय शाही जी का इतना जबरदस्त प्रतिक्रिया,मै इस पर आप लोंगो के समछ कुछ कहूँ तो ये मेरी गुस्ताखी होगी,लेकिन फिर जहाँ तक मै समझता हूँ यह विद्या बिलकुल ही सटीक और सही है अगर इसको सही से केल्कुलेट करके कुछ कहा जाय तो! जैसा की आपने अपने लेख में भी जिक्र किया है की यह गडित पर आधारित है......................... बशर्ते आज इस समाज में इस विद्या की जानकारी रखने वाले और भविष्य वाणी करने वाले इसके हकीकत में जानकर हों,आज देखा जाता है की कर्मकांड करने वाले पंडित भी भविष्य वाणी करते हैं भले ही वो इस विद्या को जानते हों या नहीं, अब चुकी लोगो की ज्योतिष में आस्था है तो लोग इनसे भी पूछ इनके बातों पर विश्वाश कर बैठते हैं जबकि कर्मकांड और ज्योतिष दोनों अलग अलग छेत्र है!आज कुछ लोग इस विद्या के बारे में आधी से भी कम जानकारी रख पैसा कमाने के चक्कर में सिर्फ लोगों भ्रमित करने के साथ साथ इस विद्या की भी धज्जियाँ उड़ाते फिर रहे है,जबकि मेरे हिसाब से कुछ हद तक सही भविष्य बाणी वही ब्यक्ति कर सकता है जो इस विद्या की गहन जानकारी रखते हुए साथ में इश्वर की शाधना कर कुछ शक्ति भी अर्जित किया हो,तथा इन्शान की सही कुंडली हो जिसके लिए इन्शान का जन्म समय,जन्म स्थान और जन्म तारीख बिलकुल ही सही होना चाहिए !यहाँ पर एक बात और कहना चाहूँगा जहाँ तक मुझे जानकारी है की किसी भी इन्शान पर उसकी अपनी कुंडली के साथ साथ उसके परिवार के अन्य सदस्यों के भी कुंडली का कुछ आंशिक प्रभाव पड़ता है.............जैसे इस कहानी में यह भी हो सकता है की राजकुमार के कुंडली के हिसाब से राजा का सर हाथी के पाव के द्वारा कुचला जाना चहिये था लेकिन राजा बच गए,संभव यह भी है की राजा की कुंडली में आगे जीवन हो या फिर उनकी पत्नी की कुंडली में उनका सुहाग का पछ बेटे की कुंडली से जयादा मजबूत हो,सो राजा को उनके बेटे की कुंडली द्वारा अरिष्ट से उनकी पत्नी के सुहाग वाले पछ ने बचा लिया हो! और रहा सवाल भाग्य और कर्म का तो सर मै कर्म से ऊपर भाग्य को मानता हूँ क्योंकि मेरे हिसाब से मनुष्य द्वारा वही कर्म किया जाता है जो उसके भाग्य में होता है..................गुस्ताखी माफ़ कीजियेगा सर मैंने इतना लम्बा भासन कह डाला,धन्यवाद!

के द्वारा:

निशा जी, प्रणाम, आपने धर्मेंद्र एवं शर्मिला टेगोर की फिल्‍म चुपके-चुपके देखी हो तो डेविड धवन जी की बात याद आ जाएगी कि विद्या एवं भाषा अपने में इतनी महान होती है कि उस का उपहास करना स्‍वंय का उपहास करना होता है। आज के समय में लोग इतने ज्ञानि हो गए है कि उनके पास अपनी बात कहने के लिए हर तरह के तर्क एवं वितर्क मौजुद है। बात भी सही है। एक मां की कोख से उत्‍पन्‍न चार बच्‍चों के स्‍वभाव एक से नही होंगे। सभी का स्‍वभाव अलग होगा। उसी तरह भविष्‍फल/राशिफल अपने में एक विद्या तो है पर उस की व्‍याख्‍या कौन किस तरह कर रहा है वह उस की श्रद्धा एवं आस्‍था पर निर्भर करता है। प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

प्रिय डेनियल जी, मै किसी की श्रद्धा को चोट नही पहुंचाना चाहता हूं मैने सिर्फ अपने विचार रखे है। हर व्‍यक्ति की अपनी सोच है व अपने विचार होते है। भई इस राशिफल के रसास्‍वादन से तो हम भी अछुते नहीं है स्‍वाद-स्‍वाद में हम भी इस अम़ृत को थोड़ा सा चख लेते है। कभी-कभी रविवार के अखबार में आए साप्‍ताहिक राशिफल/भविष्‍यफल को पढ़ने के अपने कोतुहल को त्‍याग नही पाते। पर वह एक श्रणिक मात्र ही होता है और रोज की भाग दौड़, यानि कर्म के कारण उस का प्रभाव लुप्‍त हो जाता है। श्रधेय शाही जी ने सही ही कहा है यह हमारे कर्मो से ज्‍यादा जुड़ा है और हमार कर्म ही इसे अपने पक्ष या विपक्ष की ओर मोडता है। प्रतिक्रिया का लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद।

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

तो मैं अपना विचार बता रहा था दीपक भाई कि हमारे आगे जो भी घटित होता है, वह सिर्फ़ हमारा कर्मफ़ल होता है । जैसे मैंने आपको गंजा लिखा तो यह मेरा एक कर्म हुआ । उस क्रिया (कर्म) की प्रतिक्रिया में आपने मुझे शैतान बना दिया, अर्थात मेरे कर्म का फ़ल प्राप्त हो गया । यही घटित होता है हमारे जीवन में, भविष्यफ़ल का कोई ज्योतिष नहीं होता । हां, हमारे कर्मों के आधार परिस्थिति, परिवेश और संस्कारमूलक होते हैं, तदनुरूप ही फ़ल भी मिलते हैं । कोई सपेरे का कर्म करता है तो कभी न कभी उसे सर्पदंश झेलना ही होगा । फ़िर उपचार का कर्म कर वह स्वस्थ भी हो जाता है, क्योंकि उसके पास उस कर्म का ज्ञान है । जो उपचार नहीं जानेगा, वह सर्पदंश से मृत्यु को प्राप्त होगा । सब कर्मों का खेल है, अज्ञानतावश हम कर्म करने की कलाओं को डेवलप नहीं कर पाते, जो कर लेता है, वह सुखी होता है । साधुवाद! प्रवचन थोड़ा लम्बा हो गया ।

के द्वारा:

प्रिय भाई दीपक जी, इस बार आपने काफ़ी विवादास्पद विषय का चुनाव किया है । व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि ज्योतिष शुद्ध रूप से गणित पर आधारित विज्ञान है, और भविष्य की खगोलीय, भौतिक तथा भौगोलिक घटनाओं का आभास अपनी गणना के माध्यम से दे सकता है, मानवीय जीवन की घटनाओं का नहीं । मानवीय जीवन के एक मिनट आगे की भी घटनाएं मात्र कर्मफ़ल और संयोग पर आधारित होती हैं, जिसका और कोई गणित नहीं होता । अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिन जैसे चंद्रकलाओं के चुम्बकीय प्रभाव से समुद्र के जल में उथल-पुथल (ज्वार-भाटा) होती है, कुछ वैसा ही प्रभाव मानव शरीर के रक्त संचार पर भी पड़ता है, क्योंकि रक्त भी द्रव है । ऐसी ही बहुत सारी वैज्ञानिक और खगोलीय गतिविधियों से हमारा जीवन प्रभावित होता रहता है, जो मात्र वैज्ञानिक तथ्य है । आगे फ़िर लिखना पड़ेगा पावर कट हो गया है ।

के द्वारा:

प्रणाम सर.................. इसका मतलब आपकी और भाई जी की मुलाकात मजेदार रही और इसका मतलब जल्द ही हमें कुछ हटके मिलेगा पढने को... ..भाई जी से लगता है हम सभी को कुछ आशीर्वाद लेना चाहिए.. वैसे ये विचार मेरे मन में आया था की भाई जी से मिलु लेकिन सोचा कही पारीक जी का कॉपी राइट भाई जी पे भी न हो.... क्या किया जाये विषयो का अकाल तो है क्योकि मंच पर बहुत बेहतरीन लेखक आ चुके है और कोई विषय आप सोचे लिखने को तबतक उसपे पारीक जी मिश्र जी , मनोज जी , वाजपेयी जी शाही जी .. अनीता जी चातक भाई और भी कई लोग पहले से ही पब्लिश्ड मिलते है.. अगर आप वहा से खुश होकर लौटे है तो इसका मतलब कोई जबरदस्त विषय मिल गया है आपको .. इंतज़ार में हम बैठे है ..

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

क्या बात है ... अगर ये पहली कविता है ..तो यक़ीनन इसमें अनुभव और बदलते समाज पर गहरा अध्ययन काम आया है................ एक बात आपसे जरुर कहना चाहूँगा की की लेख और व्यंग आसानी से लिखा जा सकता है पर कविता लिखना सामान्य नहीं होता कविता वही कर सकता है जिसकी निगाह दुसरो के शारीर नहीं मन के भीतर तक टटोलने की क्षमता रखती हो... मै आपको बताऊ .... की मेरी पहली कविता तो बहुत ही सर दर्द थी ....मुझे आपकी रचना पड़ते वक्त ऐसा कभी नहीं लगा की की पहली रचना है.............. मेरा विचार है की आप जरुर पहले रचना करते रहे होंगे लेकिन उसे अंतर्मन के दायरे में सीमित रखा होगा... उससे कलम और पन्नो तक नहीं लाया होगा... अब आपसे विनम्र निवेदन है की उस दायरे से बहार निकले ताकि हम जैसे पाठको को कुछ और बेहतरीन रचनायो का स्वाद मिले... शुभकामनाये

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

प्रिय अरविंद जी, लगता है ब्‍लॉग की सभी पोस्‍टों पर आप की पेनी नजर रहती है आप दिन में एक आध बार सभी प्रेमी लोगों की ब्‍लॉग एक बार जरूर खंगाल लेते हैं, तभी तो आप ने जाना की चातक जी की कोई प्रतिक्रिया हमें नहीं मिली। भाई साहब चातक जी की लोकप्रियता से प्रेरित हो कर ही तो हमने भी कुछ जुमले जोड़ने की कोशिश की और पर पता नही चला की कैसे इस कविता का जन्‍म हुआ। भई लगता है चातक जी हमारी किसी बात पर हमसे खफा है़, यदि पता चले तो हम माफी भी मांग लें। और बात रही चर्चित की सूची में आने की तो भाई यह सब आप सभी लोगों का एक सम्मिलित प्रयास ही कहूंगा कि आप लोगों ने मेरी लेखनी को सराहा तभी मै आज इस पायदान पर पहुंच पाया हूं। मै आप सभी पाठकों का तहे दिल से शुक्र गुजार हूं और भविष्‍य में भी आप सभी से ऐसी प्रतिक्रियांओं की आपेक्षा करूंगा। अब रही बात शाही जी के ज्ञानी जी की, तो भाई साहब तो इस विषय में में केवल यही कहूंगा की अभी सारे कार्ड मत खुलवाएं, इब्‍तदाए इश्‍क है रोता है क्‍या आगे आगे दे‍खीये होता है क्‍या। रही बात अब शाही जी एवं आप के प्रेम की तो भाई साहब, यह तो हम भी जानते है कि शाही जी और आप के संबंध हमसे भी पुराने है, और हमारी क्‍या बिसात के हम इस में रोड़ा बने। अरविंद जी यहां एक और याचना करना चाहूंगा कि शाही जी से थोडि सिफारिश हमारी भी कर दिजिएगा कि एक दो बार मेरी किसी पोस्‍ट पर भी अपने लैपटौप का कमाल दिखा दें शायद हम भी कुछ ऊंची उड़ान उड़ पाएं। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI दीपक जोशी DEEPAK JOSHI




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