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कलयुग के ब्रह्मा

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जैसा की आप लोग जानते है, हिन्‍दू धर्म में यह मान्‍यता है कि ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचियता कहा जाता है। उसी तरह आज इस कलयुग में एक व्‍यक्ति ऐसा भी है जिसे आप कलयुग का ब्रह्मा कहे तो गलत नहीं होगा। जी हां उन का नाम है
डॉ. बालकृष्‍ण गणपतराव मातापुरकर

 

      उन्‍हें कलयुग का ब्रह्मा क्‍यों कह रहा हूं, क्‍योंकि वह विश्‍व के पहले ऐसे भारतीय हैं जिन्‍होंने शल्‍य क्रिया में ऐसी तकनीक का अविष्‍कार किया जिसके द्वारा मानव शरीर में कुछ अंगों और टिशू (Tissues) को पुन: उत्‍पन्‍न (re-generation) किया जा सकता है और बाद में उन्‍होंने इसे अमेरिका में पेटेंट भी करवा लिया। इस तकनीक के कारण उन का दावा था कि मानव शरीर में पुराने अंग की जगह किसी और स्‍थान से उठाया गया टिशू उस जगह पर पुन: आकार अर्थात पुन: उत्‍पन्‍न हो जाता है, उन्‍होंने इस तकनीक का सफल प्रयोग बंदर पर किया जिसकी शारीरिक रचना मुनष्‍य से मिलती जुलती है और उन्‍हें सफलता मिली, जिन अंगों पर उन्‍होनें यह प्रयोग किए वह अंग है गर्भाशय (uterus), मूत्रमार्ग (urethra) और मूत्रवाहिनी (ureter) तथा साथ में किडनी व आन्‍त्र (intestine), उन्‍होंने उदर (abdominal) में कुछ खराब नसों को भी इसी तकनीक से पुन: उत्‍पन्‍न  किया जिस के कारण हर्निया जैसी बिमारी होती है।

 

 
 

      डॉ मातापुरकर के शब्‍दों में उन की यह तकनीक या तरीका अपक्‍व था और कई सालों तक उन के काम को अपने ही देश में मान्‍यतारहित माना गया किन्‍तु वह हारे नहीं और उन्‍होंने अपने संघर्ष से उसे सन 2001 में अमेरीका में पेटेंट करवा लिया जिस में केवल जानवरों पर किए गए परीक्षण ही सम्मिलित किए गए, किन्‍तु बाद में सन 2002 में उन्‍होंने मनुष्‍यों की पित्‍त की नलिका (bile duct)  व आंतो के कुछ भागों (parts of intestines) के पुन: उत्‍पन्‍न करने की तकनीक को भी पेटेंट करवा लिया।

 

      डॉ मातापुरकर के शब्‍दों में शरीर में अंगों का पुन: उत्‍पन्‍न होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है यह पेड़ पौधों व जानवरों में आम बात है जैसे के मेंढ़क, छिपकली आदि, तथा यह किसी स्‍तर तक मानव में भी संभव है।

 

       डॉ. बी.जी. मातापुरकर के विषय में मुझे उन की पत्‍नी जो की दिल्‍ली के सरकारी अस्‍पताल में बालरोग विशेषज्ञ थी, द्वारा आज से लगभग 12 -13 वर्ष पूर्व मुलाकात में पता चला था। उन्‍होंने ही मुंझे बताया की इस शोध पर कार्य करने का विचार उन्‍हें स्‍वप्‍न में आया था। डॉ. मातापुरकर भी दिल्‍ली के ही एक सरकारी अस्‍पताल, मौलाना आजाद मैडिकल कालेज में वरिष्‍ठ शल्‍य चिकित्‍सक की हैसियत से कार्य करते थे, उन्‍हें एक बार स्‍वप्‍न में किसी ने कहा की आप इस खोज पर कार्य करे, जब वह जागे तो उन्‍हे उन का स्‍वप्‍न याद रहा, और क्‍योंकि वह भी एक सर्जन थे उन्‍हें उस स्‍वप्‍न पर विश्‍वास नही हुआ कि विज्ञान में ऐसा संभव है, किन्‍तु उन के मस्‍तिष्‍क में वह घुमता रहा, उन्‍होंने इस का जिक्र अपनी पत्‍नी से किया तो उन्‍हें भी इस पर विश्‍वास नहीं हुआ, फिर कुछ दिनों के पश्‍चात उन्‍हें वही स्‍वप्‍न पुन: दिखाई दिया तो उन्‍होंने उसे गम्‍भीरता से लिया और अपनी पत्‍नी से भी उस विषय में चर्चा करी। उनकी पत्‍नी भी धार्मिक विचारों वाली महिला थी, तो उन्‍होंने दिमाग लगाया कि इस स्‍वप्‍न में कुछ सच्‍चाई तो है जो दो-बार उनके पति को दिखाई दे रहा है । तब उन्‍होंने अपने पति से कहा आप सोचो इस विषय पर शायद आप ऐसा कर सकते हैं। और यही से प्रेरणा पाकर उन्‍होंने मानव समाज के लिए यह तकनीक विकसित की है।

 

      पर हमारे देश की राजनीति ऐसी है कि जिस व्‍यक्‍ति की ऊपर तक पहुंच न हो उसे इतने बड़े आविष्‍कार के लिए कोई सम्‍मान या पुरस्‍कार नहीं मिला । तथापि उन्‍होनें हार नहीं मानी वे अपने कार्य में लगे रहे । बाद में, विदेशों में उन के द्वारा कि गई खोज को सराहा गया व बड़े-बड़े जनरलों में छापा गया।

 

      आप सोचेंगे की मै क्‍यों ऐसा लिख कर डॉ. मातापुरकर के विषय में बताना चाहता हूं या मुझे उनकी याद क्‍यों आई? क्‍योंकि मुझे नेट पर श्री सुरेश सोनी का एक लेख पढ़ने को मिला जिसके कारण मुझे अचानक ही डॉ मातापुरकर जी की याद आ गई। सुरेश सोनी जी ने अपने लेख में उल्‍लेख किया है कि “कितनी उन्नत थी भारत की प्राचीन चिकित्सा पध्दति” जो इस प्रकार है –

 

जयपुर के डॉ. विजय दया (एम.डी-एनीस्थिशिआ) ने प्लास्टिक सर्जरी के एक प्रयोग का वर्णन किया है। लगभग दो सौ वर्ष पूर्व सन् 1792 में टीपू सुल्तान तथा मराठों के बीच हुए युद्ध में चार मराठा सैनिकों तथा एक गाड़ीवान के हाथ और नाक कट गए। साल भर बाद गाड़ीवान कवास जी और सैनिकों को पुणे के एक कुम्हार ने शल्य-चिकित्सा के द्वारा नई नाक लगा दी। वह कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाने के साथ-साथ कटे मानव अंगों को जोड़ने में भी कुशल था और रोगी के शरीर से चमड़ी निकाल कर उससे कटे-फटे अंगों की मरम्मत करने में उसे महारत हासिल थी। मानव शरीर की इस प्रकार “मरम्मत” कर देने को आधुनिक औषधि-विज्ञान में “प्लास्टिक सर्जरी” कहा जाता है। ईस्वी सन् 1793 में कवास जी की नई नाक बना देने की शल्य-क्रिया को दो अंग्रेज चिकित्सकों डा. थामस क्रसो तथा डा. जेम्स फिण्डले ने भी देखा। दोनों अंग्रेज चिकित्सकों ने पूरी प्रक्रिया के चित्र भी लिए तथा इसकी रपट “मद्रास गजट” में प्रकाशित की। इसी रपट को अक्तूबर 1794 में लंदन (इंग्लैण्ड) से प्रकाशित होने वाली “जेण्टलमैन पत्रिका” ने भी छापा गया।

 

      मै इस लेख के माध्‍यम से व इस मंच के सहयोग से ऐसे महान पुरूष डॉ. बालकृष्‍ण गणपतराव मातापुरकर  को बधाई देना चाहता हूं। जिन्‍होंने चिकित्‍सा के क्षेत्र में एक नई खोज का अविष्‍कार किया तथा भारत के गौरव को बढ़ाया।

 

      उनके काम और उन के द्वारा पेटेंट कराने के विषय में मुझे थोड़ी बहुत जानकारी उनकी पत्‍नी डा. (श्रीमती) आशा मातापुरकर से मिली थी किन्‍तु मैने अधिक जानकारी नेट पर खोजी तथा पाठकों को जानकारी उपलब्‍ध कराने के लिए उस का हिन्‍दी रूपातंर प्रस्‍तुत किया है। अधिक जानकारी के लिए यहां कुछ साईटों के लिंक दे रहा हूं -

http://www.rrtd.nic.in/ddjune2k1.htm

http://en.wikipedia.org/wiki/B.G._Matapurkar

http://www.pharmabiz.com/article/detnews.asp?Arch=&articleid=7705&sectionid=44

 

लेकिन अभी भी मेरे मन में एक प्रश्‍न कौंध रहा है कि क्‍यों हम कुछ महान व्‍यक्तियों को वह सम्‍मान नहीं देना चाहते जिसके कि वह हकदार है । डा. मातापुरकर ही नहीं अनेक ऐसे गुमनाम लेकिन कार्य से महान व्‍यक्ति हैं जिनके कार्य का श्रेय किसी अन्‍य ने उठाया व उसके दम पर लाभ पाया है ।

 

-दीपकजोशी63



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39 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

howe mortgage के द्वारा
August 5, 2011

Thank you very much for that magnificent article

Arvind Pareek के द्वारा
January 1, 2011

नव वर्ष 2011 आपके व आपके परिवार के साथ सभी के लिए सुखदायक, मंगलकारी व आन्नeददायक हो। आपकी सारी इच्छाiएं पूर्ण हो व सपनों को साकार करें। आप जिस भी क्षेत्र में कदम बढ़ाएं, सफलता आपके कदम चूमें। Wish you a very Happy New Year 2011. May the New Year turn all your dreams into reality and all your efforts into great achievements. अरविन्द पारीक ARVIND PAREEK http://bhaijikahin.jagranjunction.com

Dr. M. S. Prasad के द्वारा
December 28, 2010

एक लम्बे अंतराल के बाद अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा हूँ। विलम्ब के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। डा. मातापुरकर के बारे में आपका लेख पूर्णतः सटीक है और सच मानिए तो उन्हें जितना सम्मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिला। इसे मैं समाज की कुव्यवस्था ही कहूँगा। डा. मातापुरकर एक ब्रह्मा और वैज्ञानिक तो हैं ही साथ ही एक प्रखर कवि और साहित्यकार भी हैं। उनकी रचना अधिकतर मराठी में है। उनकी कविता में एक ओज है जो पारखी ही पकड़ पाता है। मेरी तरफ से आपको बधाई और धन्यवाद। भवदीय डा. एम. एस. प्रसाद अवकाश प्राप्त परामर्शदाता एवं विभागाध्यक्ष (बाल-रोग विभाग) सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली.

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    January 2, 2011

    सर्व प्रथम तो आप को नव वर्ष की बहुत-बहुत बधाई, आप के द्वारा प्राप्‍त इस प्रतिक्रिया के लिए मै आप का आभारी हूं तथा यह जानकारी भी देने के लिए कि डॉ मातापुरकर जी एक प्रखर कवि भी है। -दीपकजोशी63 deepakjoshi_sjh@yahoo.co.in

Arvind Pareek के द्वारा
November 30, 2010

प्रिय श्री दीपक जोशी जी, आपके मन में कौंध रहे प्रश्‍न का उत्तर केवल हमारी लालफीताशाही और नौकरशाही है। जहां बैठे लोग किसी भी तरह के निर्णय के लिए भले ही अयोग्‍य हो लेकिन वे स्‍वयं को सबसे बड़ा तीसमारखां समझते हैं। किसी के मन भी ये भाव नहीं होता कि कोई कितना महान है। यदि वे किसी से उपकृत है तो उसका साधारण सा कार्य भी उनके लिए महानतम होता है। इसके लिए आप हमारी पदमश्री, पदमभूषण व भारत रत्‍न जैसे पुरस्‍कारों की सूची देख सकते हैं। जिससे अभी भी अनेक ऐसे नाम है जिनसे महान कार्य करने वाले को कोई पुरस्‍कार आज तक नहीं मिला है। खैर इस कलयुग के बह्मा को हम केवल अपना सलाम व मन से सम्‍मान ही दे सकते हैं। और कुछ नहीं……… अरविन्‍द पारीक

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 30, 2010

    प्रिय अरविंद जी, प्रणाम भई बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में आप ने लालफीताशाही और नौकरशाहों पर गुस्‍सा उतारा है, आप ने सही ही कहा है कि आज पदमश्री, पदमभूषण व भारत रत्‍न जैसे पुरस्‍कारों में भी आज कल ऐप्रोच को ही महत्‍व दिया जाता है। बहुत ही सुन्‍दर प्रतिक्रिया के लिए आभार। -दीपकजोशी63

sdvajpayee के द्वारा
November 30, 2010

भारत का चिकित्सा विज्ञान वैदिक काल में बहुत उन्नत बताया जाता है। एक अखिल भारतीय सर्जन -कान्फ्रेंस में मैंने अमेरिकी विशेषज्ञ सर्जन के प्रेजेंटेशन में सुना था कि सर्जरी की विधा भी भारत में ही विकसित हुई थी। अब इस क्षेत्र में पाश्चात्य पद्धति को बहुत आगे और आयुर्वेदिक को बहुत पीछे माना जाता है। हम अपनी उपलब्धियों को अपेक्षित ढंग से सहेजने के प्रति सजग नहीं रहे हैं। इससे काफी क्षति उठानी पड़ी है। आपने डा. माता पुरकर जी को याद कर भारतीय जनमानस की इस सनातनी कमी को याद दिलाया है।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 30, 2010

    आदरणीय वाजपेयी जी, प्रणाम, आप ने सही ही कहा है आज की आधुनिक सर्जरी की विद्या भारत में ही विकसित हुई पर हम अपनी धरोहर को सहेज न पाए, यही बात कही और भी अविष्‍कारों के लिए भी कहें तो सही होगा जैसे वेदों में कई विज्ञान छुपे हुए थे जिन्‍हे विदेशीयों ने चुराया और अपना अविष्‍कार कह कर परोसा। प्रतिक्रिया देने के लिए आभार एवं धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

roshni के द्वारा
November 29, 2010

दीपक जोशी जी इतनी महान इंसान से रूबरू करवाने के लिए धन्यवाद …… हमे इन महान लोगों पे गर्व है …

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    रोशनी जी प्रणाम, भई यह तो उस महान पुरूष के कार्य है जो वैसे तो गुमनाम है किन्‍तु शायद इस मंच के माध्‍यम से कुछ लोग तो उन्‍हें जान ही जाऐगे। मेरा प्रयास सफल रहा। प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

ashutoshda के द्वारा
November 29, 2010

जोशी जी महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए धन्यवाद् आशा करते है की उनकों उचित सम्मान मिलें रही बात अन्य लोगो की जिनकी उपलब्धियों का लाभ किसी और ने उठा लिया तो इश्वर सब देखता है करनी का फल सबकों मिलता है आशुतोष दा

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय आशुतोष जी, आप ने सही कहा जो जिसे मिलना है वह मिलेगा, भगवान नए रास्‍ते बनाता रहता है शायद मुझे ही आगे करके उस महापुरूष को याद करने का अवसर प्रदान किया। प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

abodhbaalak के द्वारा
November 29, 2010

दीपक जी, हम कितने अनजान है उन लोगों से जिन्हें हमें वास्तव में अपना आदर्श और हीरो समझना चाहिए. आपका धन्यवाद की आपने ऐसी हस्ती से हमारा परिचय कराया जिन्हें वास्तव में ढेरो सम्मान और प्रंशसा मिलनी चाहिए डॉ. बालकृष्‍ण गणपतराव मातापुरकर जी के बारे में जानकारी हम सब के बांटने की लिए आपका बहुत बहतु धन्यवाद http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय अबोध जी, प्रणाम भई, यह सही है कि कुछ महान लोग गुमनाम रह जाते है किंतु गाहे बगाहे कही न कही व याद आ ही जाते है। उन का काम ही उन्‍हें सम्‍मान दिला देता है। जैसे डां बी.जी.मातापुरकर। लेख एवं डॉ साहब की सराहना के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

allrounder के द्वारा
November 29, 2010

Deepak ji aapke lekh ke shirshak ko dekhkar main soch raha tha ki ye koi dharmik lekh hoga kintu lekh padhne ke baad pata chala ki iski vishy – vastu vilkul bhinn hai ! aapne sahi kaha brahma ji ka karya bhi manushya ke kalyaan karne ka hai aur agar aisa hi koi manav kalyaankaari karya koi manushy karta hai to veh bhi braham tulya ho jaata hai ! Jaankaari bhare lekh ke liye badhaai !

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय आलराऊंडर जी, प्रणाम भाई डॉ साहब के अविष्‍कार के विषय में सुन कर हमें भी आश्‍चर्य हुआ या कहें विश्‍वास नहीं हुआ किंतु अचानक नेट पर खोजते खोजते हम कहा से कहा पहुंच गए और सच्‍चाई आप सब के साथ बांट ली। प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

R K KHURANA के द्वारा
November 29, 2010

priy joshi ji, bahut sunder jakari ! thank you Khurana

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    आदरणीय खुराना जी प्रणाम, भाई साहब लगता है कुछ व्‍यस्‍त ज्‍यादा है बहुत जलदी में प्रतिक्रिया दी है। पर आप की प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

razia mirza के द्वारा
November 29, 2010

कलयुग के ब्रहम्मा के बारे में आपसे बढ़िया जानकारी mili

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    रजिया जी, आदाब, आप की प्रतिक्रिया के लिए आभार। -दीपकजोशी63

kmmishra के द्वारा
November 29, 2010

जोशी जी सादर वंदेमातरम ! आज आप ने बेहतरीन जानकारी दी है । . शल्‍य क्रिया में ऐसी तकनीक का अविष्‍कार किया जिसके द्वारा मानव शरीर में कुछ अंगों और टिशू (Tissues) को पुन: उत्‍पन्‍न (re-generation) किया जा सकता है और बाद में उन्‍होंने इसे अमेरिका में पेटेंट भी करवा लिया। . डा0 मातापुरकर जी को नमन है । निसंदेह उन्होंने ऐसा ईश्वरीय प्रेरणा से ही किया है । मेरा पास भी कुछ जानकारियों हैं इससे संबन्धित । जल्द ही लिखूंगा । आपका बहुत बहुत आभार ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय मिश्रा जी, भई गर्मजोशी एवं प्रेम से ओतप्रोत आप की सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद। आप ने सही ही कहा है मानव जगत की भलाई के लिए ईश्‍वर किसी न किसी रूप में अवतरित होकर उस के भले के लिए कुछ नए अविष्‍कार करवाता ही रहता है जिस से जगत का कल्‍याण हो। शायद डॉ मातापुरकर को भी इसी लिए उन्‍होंने प्रेरणा उन के स्‍वप्‍न में आकर दी थी। आप की जानकारीयों का मुझे बे-सबरी से इंतजार रहेगा। धन्‍यवाद -दीपकजोशी63

Alkar Gupta के द्वारा
November 29, 2010

श्री दीपक जी   अभिवादन ,  ऐसी महान विभूति के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक होती हूँ  अपने ही देश में  इतनी महान प्रतिभाएं सम्मान व पुरस्कार से वंचित रह जातीं हैं बहुत जानकारी देता हुआ ज्ञानवर्धक लेख है।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    अलका जी प्रणाम यह हमारी विड़म्‍बना ही तो है कि जब विदेशी मुल्‍कों में हमारे अविष्‍कारक सम्‍मानित होते है तभी हम उन्‍हें पुछते है क्‍यों नहीं हम उन को अपने देश मे सम्‍मानित करते है या तो समझ का फेर है या कुछ और अपनी समझ से परे है। लेख की सराहना के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

rajeev dubey के द्वारा
November 28, 2010

आपके प्रेरणाप्रद लेखों के लिए साधुवाद …

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय राजीव जी, प्रणाम भई मेरे लेखों की सराहना करने के लिए आप का बहुत-बहुत धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

nupur saraswat के द्वारा
November 28, 2010

दीपक जी प्रणाम ….. में ब्लॉग लिखती नहीं हु पर पढ़ती ज़रूर हु और जादा कमेंट्स नहीं देती पर आपके ब्लॉग को पढने क बाद mujhse रहा नहीं गया तो मेने कमेन्ट दे हे दिया मेने आपका लतेस्ट ब्लॉग पूरा नहीं पढ़ा पर जितना भी पढ़ा है उससे शायद लगता है की आप जो भी लिखते है उसमे एक सचाई है वो सरे ब्लॉग जिस्स्प आपने लिखा है वो लगता है की वो सब आपने देखा है होते हुए में क्या बोलू मुझे समझ nahi आ रहा है बस आपको शुभ कमाना देना चाहुंगे आप यु हे लिखते रहे ये लिखने की जो एक कला है वो बहौत अच्छी है और बहौत कम हे लोगो को प्राप्त होती है उन लोगो में आप भी शामिल hai इससे हमेशा चालू रखे ……

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    नुपुर जी, प्रणाम भई यह जानकर खुशी हुई की आप जागरण जंकशन के ब्‍लॉग पढती रहती है किन्‍तु जवाब नहीं देती थी किन्‍तु आज आप ने जवाब देने की ठान ही ली। अच्‍छा लगा आप में भी प्रतिक्रिया देने का जज्‍बा उमंड आया इस से आप की लिखने की प्रतिभा भी जागृत होगी। अच्‍छा प्रयास एवं प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत सा धन्‍यवाद।

आर.एन. शाही के द्वारा
November 28, 2010

दीपक भाई, अपने ही देश में मेधा के हतोत्साहित होने की बहुत सारी घटनाओं की फ़ेहरिस्त है । गणित के महान विद्वान वशिष्ठ सिंह भी एक मिसाल रहे हैं, जिन्हें उपेक्षा के कारण विक्षिप्तों जैसा जीवन जीने को बाध्य होना पड़ा । यहां की राजनीति और सत्ता के कुचक्र ने जितना नुकसान देश का किया है, उतनी क्षति तो दुश्मन देशों के षड्यंत्र से भी नहीं हुई है । एक क़ाबिल अनुसंधानकर्त्ता विद्वान के विषय में जानकारी देने के लिये साधुवाद ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    आदरणीय शाही जी, प्रणाम भाई साहब आप ने सही कहा है, यह हम भारतवासीयों की एक परंपरा है जिस की लाठी उस की भैंस, यहां भैस से तात्‍पर्य है कि यदि उस की ऊपर तक पहुंच है या वह पैसे वाला है तो उस का नाम होगा वर्ना उसे कोई नहीं पुछता। प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद -दीपकजोशी63

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 28, 2010

आदरनीय दीपक जी,वाक्य्यी यहाँ आज भी ऐसी विभूतियाँ पड़ी है जिनको सम्मान देना उचित नहीं समझा जाता,जबकि सम्मान के हक़दार को सम्मान मिलना ही चाहिए,ऐसी महान विभूति को मेरा नमन,धन्यवाद!

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय धर्मेश जी, प्रणाम भाई आप ने सही कहा है भारत में ऐसी बहुत सी विभूतियां है जो गुमनामी मे ही रह जातीं है। आप ने 3 ईडियट फिल्‍म देखी होगी उस का भी सार यही है कि इतना ज्ञानी होते हुए हिरो (अमीर खान) अंत में क्‍यों कि उस की पहुंच नही थी इस लिए गुमनामी मे ही जीने लगा। प्रितिक्रिया के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

nishamittal के द्वारा
November 28, 2010

जोशीजी,सादर अभिवादन.इतनी अच्छी जानकारी देने के लिए साधुवाद.संभवतः ईश्वर उनसे ये कार्य कराना चाहते होंगें इसलिए उनको स्वप्न दिखाई दिया होगा.हमारे देश का दुर्भाग्य यही है की हमारी प्रतिभाओं की कद्र तब होती है जब विदेशी मुहर उस पर लगती है.ऐसे लोग ही भारत रत्न सदृश पुरुस्कारों के पात्र हैं.काश हमारे कर्णधार समझें.

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    आदरणीय निशा जी, प्रणाम, आप ने सही कहा है हम भारतीयों में विदेशी वस्‍तुओं से इतना लगाव है कि देश में बनी हुई वस्‍तु पर यदि लिख दिया जाए मेड इन जापान तो वह घडल्‍ले से बिकती है अन्‍यथा उसे कोई नहीं पुछता। वही बात डॉ.बी;जी; मातापुरकर के साथ भी हुई कि भारत में उनके काम को समझने वाले कम लोग थे तथा शायद कही उन का नाम न हो जाए इस कारण उन की खोज का ज्‍यादा तरजीह नहीं दी किन्‍तु विदेशी मोहर लगते ही उसे एक पहचान देनी ही पड़ी। प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद -दीपकजोशी63

NIKHIL PANDEY के द्वारा
November 28, 2010

जोशी जी अभिवादन स्वीकार करे,,,,,, …आपने बहुत बढ़िया किया जो इस लेख के माध्यम से हमें डॉ. बालकृष्‍ण गणपतराव मातापुरकर जी और उनके इस शोध के विषय में बताया … मेरी तरफ से उन्हें हार्दिक शुभकामनाये….. ……

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय निखिल जी, प्रणाम भई भला हो इस नेट का जिस पर बैठ कर कुछ भूली बिसरी यादें फिर से ताजा हो जाती है। 15-16 वर्ष पुरानी बात थी दिमाग में कभी भी नहीं आती किन्‍तु अचानक नेट पर सोनी जी का लेख पढ़ा तो पुरानी बात ताजा हो गई जिसे मैने आप सब से बांट लिया। मेरे विचार से ऐसे महापुरूष और अविष्‍कारक को इस तरह इस मंच के द्वारा ही कुछ तो सम्‍मान मिलेगा। प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 28, 2010

शीर्षक देख कर कुछ ओर लगा………… पर पढ़ने के बाद बहुत सुखद अनुभूति हुई……….. यहाँ भारत मे भ्रष्टाचार के क्षेत्र मे खोज होती है ओर उनकी ही चर्चा है………. इस लिए इस तरह के डॉक्टर चर्चा नहीं पाते पर जब बाहर इनका सम्मान होता है तो राजनेता भी इनको याद करते हैं…………..

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय पियूष जी, प्रणाम भई लिफाफा देख कर मजमून न जाना किजिए उस को खोल कर भी देखा किजिए। आप ने ठिक ही कहा है भष्‍टाचार के क्षेत्र में खोज होती है और उन की ही चर्चा है। महान विभूतियां अंधकार/गुमनाम ही रह जाती है। प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63


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