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बातें जो रह गई याद

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हाय हैलो.............

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      पाठकों मैं ब्‍लाग पढ़ते पढ़ते यह सोचने लगा कि यह भाई जी भी किस मिट्टी के बने है वैसे तो बात बात पर तुनक जाते है समाज की हर बीमारी पर इन की नजर रहती है पर यह बन्‍दा क्‍यों अभी तक कनफोड़ मशीन (मोबाईल) के चक्‍कर में नहीं पड़ा। या तो वह इस मशीन से घबरा गए है या जान बुझ कर उस तरफ देखना ही नही चाहते। एक बात और समझ में नही आती की क्‍या इन कि घर्म पत्‍नी भी इन के साथ नही रहती है, उसे भी माता पिता के पास गांव में ही छोड़ कर आए हैं। ऐसा इस लिए कह रहा हूं कि आज के वातावरण (समाज) में यही प्रथा चल पड़ी है। पत्‍नीयां सभी की समझदार हो गई है और वो अपने पतियों को मोबाईल जरूर लेकर देती है चाहें अपनी जेबखर्ची बचा कर ही क्‍यों न।

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      भाई, आखिर क्‍यों न हों बैल के नकेल डालने का एक सीधा और सरल तरीका यही तो है।‍

सुनिए एक वार्तालाप-

पत्‍नी : ऐ जी, कहां पर हो ?

पति : आफिस में हूं क्‍यों ?

पत्‍नी : आज इतनी देर कैसे हो गई, अच्‍छा आते समय बाजार से मुन्‍ना के लिए दो कापी लेते आना।  

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पति : (थोड़ा झुन्‍झुला कर) भई 9.00 बजे ससुर जी की दुकान तो है नहीं जो खुलवा कर सामान ले आता। तुम शाम को ही क्‍यों नहीं ले आईं।

 

पत्‍नी : आप को तो लगता है जैसे मैं घर पर दिन भर खाली ही बैठी रहती हूं। और हां मैं तो बताना भूल ही गई एक किलो सर्फ भी लेते आना वर्ना सुबह कपड़े धोते समय तुम ही नाराज होगे की सर्फ नहीं था सो पहले से ही बता रही हुं।

 

तो भाई लोगों यह तो मैं अपनी आप बीती, आप से बतिया रहा हूं क्‍यों कि दिल कि बात किसी से बता दो तो मन कुछ हल्‍का हो जाता है। और हां यह सारा कलेश ससुरा इस मोबाईल का ही है। हम मर्दो कि प्राईवेसी तो खतम ही समझो। 

 

पाठकों यह मोबाईल खरीद तो लिया है पर है बहुत खतरनाक, अब बहुत पछता रहा हूं ।

भाई सुबह सुबह संड़ास को गए थे कि बॉस का फोन आ गया। कहां थे कितनी देर से घंटी बजा रहा हूं फोन क्‍यों नही उठाया? अब इन को कौन समझाए कि भाई यह मोबाइल है तो क्‍या हम भी मोबाईल हो जाएं। चौ‍थ की कथा के गणेश जी महाराज तो हैं नहीं कि सारे घर में जहां तहां निपट लें और बाद में सब सोना हो जाएगा । हम तो एक अदना से इंसान भर हैं यदि लोग माने तों ?

 

पर पाठकों यह मोबाईल दुर्घटनाओं को भी बुलावा देता है। 

 

आज का युवा वर्ग चाहे वह लड़का हो या लड़की रोड़ पर या बस में या घर पर उनके कान पर यह यंत्र लगा ही रहता है। रोड़ पर चलते हुए यह लोग इतने तल्‍लीनता से वार्तालाप में खो जाते है कि इन को पता ही नही होता की पीछे से भी कोई ट्रैफिक आ रहा है या नहीं। 

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एक नजारा और पाठकों सुबह 5-5.30 बजे हम पार्क में टहलने जाने लगे। भई बहुत अच्‍छा लगता था सुबह कि ता‍जी आबो-हवा का आनंद लेते हुए हम पार्क के चक्‍कर लगाते थे। पर आज कल एक नया कल्‍चर पार्क में देखने को मिलता है, आप ने हमारे बाल तो देख ही लिए होंगे, जो उम्र से पहले ही धोखा दे गए पर हम से भी ज्‍यादा यंग (50-55 की आयु के पुरूष) भी आज कल कान में हेड फोन लगा कर गाने सुनते हुए सुबह कि सैर करने निकलते है। 

 

मै और मेरी पत्‍नी भी सुबह साथ में रोज सैर के लिए जाते है पर कई बार सैर का रूटीन टूट जाता था तो हमारी पत्‍नी बोली- ऐ जी आप ऐसे किया करो कि मोबाईल साथ ले जाया करो और उस में गाने लगा कर हैड़ फोन लगा लिया करो ताकि आप को अकेलापन न महसूस हो। तो पाठको यह एक अकेलेपन का भी साथी है।

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चलिए एक बानगी और देखियें – अभी सोकर उठा ही था कि मोबाईल चिल्‍लाया – एसएमएस आया, एसएमएस आया, एसएमएस आया, एसएमएस आया । मैं चौंका आखिर इसे कैसे पता चला कि एसएमएस आया । ये तो बाद में पता चला कि मेरी पूत्री ने दो बार टन टन बोलनें वाली एसएमएस की टोन की जगह यह बार-बार एसएमएस आया, एसएमएस आया बोलनें वाली बच्‍चे की आवाज की टोन लगा दी थी । खैर जब इन मोबाईल महाराज से एसएमएस दिखानें का अनुरोध किया तो देखा कुछ लिखा ही नहीं हैं बस नीचे देखनें का इशारा भर है । आखिर काफी देर बाद जब अंत पर पहूँचा तो पता चला भाईजी ने एसएमएस भेजा हैं कि लिखनें को कुछ नहीं था परंतु आपकों याद करना जरूरी था इसलिए यह एसएमएस ही सही । तो आजकल एसएमएस भी बिना मतलब के भेजे जा रहें हैं लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं मतलब की छाप छोड़ जाते हैं ।

 

      आप क्‍या सोचते हैं लिखियेगा जरूर ?

 

-         दीपक जोशी



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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

roshni के द्वारा
September 13, 2010

आदरनिये दीपक जी मोबाइल के बारे में बहुत ही अच्छी जानकारी दी अपने ,, खैर जब इन मोबाईल महाराज से एसएमएस दिखानें का अनुरोध किया तो देखा कुछ लिखा ही नहीं हैं बस नीचे देखनें का इशारा भर है । आखिर काफी देर बाद जब अंत पर पहूँचा तो पता चला भाईजी ने एसएमएस भेजा हैं कि लिखनें को कुछ नहीं था परंतु आपकों याद करना जरूरी था इसलिए यह एसएमएस ही सही । बहुत खूब लिखा अपने.. हम भी अक्सर ऐसे एसएमएस से परेशान हो जाते है .. आभार सहित

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 14, 2010

    रोशनी जी, आप ने पोस्‍ट को पढ़ा एवं सराहा, इस के लिए मै आपका आभारी हूं और आशा करता हूं की भविष्‍य में भी ऐसा ही सहयोग मिलता रहेगा। दीपक जोशी

Arvind Pareek के द्वारा
September 13, 2010

प्रिय दीपक जोशी जी, याद रह गई बातों को बॉंटनें का अच्‍छा सिलसिला शुरू किया है । मोबाईल के बहानें भाईजी की खिंचाई भई मजा आ गया । इसी तरह लिखते रहिए व मजा देते रहिए । एक अच्‍छी पोस्‍ट … बधाई । अरविन्‍द पारीक

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 13, 2010

    प्रिय अरविंद जी, पोस्‍ट की सरहाना के लिए धन्‍यवाद, भाई हमें तो आप से अच्‍छे, भाई जी ही लगे तो हम ने सोचा क्‍यों न उन को ही आगे करके कुछ कहा जाए।

R K KHURANA के द्वारा
September 12, 2010

प्रिय दीपक जी अच्छा व्यंग है ! मोबाईल की महिमा अपरम्पार है ! मोबाईल नहीं तो जिन्दगी बेकार है ! मोबाईल झूठ बोलने का देता अच्छा आधार है ! इस मोबाईल को बार बार नमस्कार है ! खुराना

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 12, 2010

    प्रिय खुराना जी, धन्‍यवाद जो इन आप ने इस कविता के माध्‍यम से मोबाईल की महिमा का गुणगान किया है, तथा मेरी इस रचना को सराहा है और आशा करता हूं की आगे भी आप से इसी प्रकार प्रोत्‍साहन मिलता रहेगा। – दीपक जोशी

Dharmesh Tiwari के द्वारा
September 12, 2010

आदरणीय जोशी जी,कहीं यह यंत्र जरूरी है तो कहीं बकवास,पर है बहुत ही बढ़िया,धन्यवाद

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 12, 2010

    प्रिय धर्मेश जी, धन्‍यवाद, आप ने सही ही कहा है की इस यंत्र की महिमा अपरम्‍पार है और यदि इस पर लिखने बैठ गए तो एक दुसरी पुराण लिख जाएगी।

Ramesh bajpai के द्वारा
September 12, 2010

दीपक जी बिलकुल हवा के खुशनुमा झोके की तरह खुश कर गया आपका लेखन . बहुत बहुत बधाई

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 12, 2010

    प्रिय रमेश बाजपेयी जी, धन्‍यवाद सराहना के लिए, मैं तो उन्‍मुक्‍त विचार रखता हूं और सीधी बातो से मन में दबे विचारों को यहा व्‍यक्‍त कर रहा हूं। आप लोगों कि इसी तरह सराहना से प्रेरित हो आगे भी लिखने को प्रोत्‍साहन मिलेगा। दीपक जोशी

Piyush Pant के द्वारा
September 12, 2010

बहुत बढ़िया व्यंग…………… पर ये कान पर एअर फोन लगाकर बाइक चलने वाले पीछे आती गाड़ी के होर्न को सुनते नहीं और फिर भुगतना उन माता पिता को पड़ता है जिन्होंने ये मोबाइल दिलाया……. पर कई सुविधाएँ है………… पहले जब हम छोटे थे तो अपने घर से बाहर आ कर दुसरे को बुलाने के लिए सिटी बजाते या कोई और इशारा करते……….. पर अब मिस कॉल करो अगला हाज़िर…….

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 12, 2010

    प्रिय पियूष जी, आप का जवाब बहुत मजेदार लगा। पर ऐसा लगा कि शायद आप को इस से एक नया ब्‍लाग लिखने का अडिया मिल गया – मिस कॉल – अच्‍छा है, बातों से बातें निकलती है और समाज के लिए एक कुछ नई सीख।

chaatak के द्वारा
September 12, 2010

मोबाइल का ये किस्सा अच्छा लगा| बचपन में हम जिस तन्न्लीनता से सिबाका संगीतमाला (सप्ताह में सिर्फ एक बार) कान से रेडिओ सेट लगाकर सुना करते थे आज जब नई पीढ़ी को २४ घंटे मोबाइल सुनते देखता हूँ तो बड़ी दिली तसल्ली हो जाती है और उस समय पापा की नजरों से बचा कर किये गए कृत्य का अपराधबोध भी कम हो जाता है | अच्छी पोस्ट पर बधाई!

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 12, 2010

    प्रिय चातक जी, धन्‍यवाद, पर आप की कही बातों को आगे बढ़ाते हुए कहुंगा, कि वो जमाना और था। पुरा परिवार उस संगीत का मजा, मिल कर उठाता था। मैं आप की आयु से अंदाजा लगा सकता हूं कि आप विविध भारती पर आने वाले कार्यक्रम हवामहल को नहीं सुना होगा, वो उस जमाने का रात 9 बजे का सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम होता था जिसे पुरा परिवार बहुत ध्‍यान से सुनता था। पर आज की नई पीढ़ी केवल कंप्‍यूटर, टीवी, एवं मोबाईल में ही उलझ कर रह गई है तथा सामाजिक एवं पारिवारिक दायत्‍व से भी दूर हो गई है।

आर.एन. शाही के द्वारा
September 12, 2010

दीपक जी बहुत मज़ेदार और गुदगुदाने वाला पोस्ट … बधाई । और लिखिये ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 12, 2010

    प्रिय शाही जी प्रोत्‍साहन देने के लिए धन्‍यवाद, हम तो केवल मन के विचार जो प्रकट नही कर पाते थे इस मंच के द्वारा लिख रहें हैं।


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