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बातें जो रह गई याद

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रातों की नींद उड़ जाती हैं

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बलमा हमार मोटर कार ले के आयो रे।

बलमा हमार मोटर धक्‍का दे दे चलावो रे।

बलमा हमार होरनवा खुब बजावो रे।

 

      यह तो नही जानता कि यह पं‍क्तियां किसी फिल्‍म से है या किसी लोक गीत से।

छोडिये दिमाग पर जोर देने से क्‍या फायदा भावनाओं को समझिये अर्थ में क्‍या रखा है, तो मित्रों ऊपर लिखी पंक्तियां पता नहीं किस सन् व साल में लिखी गई होगी, पर कहते है न कि कवि तो बहुत दुर तक देख सकता है उसने आज की तस्‍वीर पहले ही देख ली. आज रूपये का स्‍टेटस भी बढ़ गया है जो 4000 पाता था अब वह 8000 से 10,000 कमा रहा है. कार खरीदना व उसे मेंटेन करना, मिडल क्‍लास के लिए थोड़ा मुश्किल है किन्‍तु बाईक तो हर कोई मेंटेंन कर लेता है. क्‍योंकि उस में एवरेज अच्‍छी मिल जाती है.

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      ऊपर लिखी भूमिका का तात्‍पर्य यह है कि आज की तारीख में दिल्‍ली में 95 प्रतिशत दुपहिया वाहन यदि रोड पर है तो उन में आप को बाईक ही दिखाई देगी. और उन में चाहे नए व पुराने चालक सभी एक ही मटटी के बने है जिन का एक हाथ केवल रेस पर व दुसरा होरन पर ही रहता है. बेचारी दिल्‍ली ट्रेफिक पुलिस, जिस ने बहुत विज्ञापन दिए और स्टिकर बाटें जिस पर लिखा होता है कि कुत्ता भी बिना वजह नही भौंकता अत: कृपया होरन का प्रयोग बिना वजह न करें, पर दिल्‍ली वालों का नारा एक ही है कि हम नही सुधरेंगें.

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आज आलम यह है कि बच्‍चा 12 पास करते ही अपने पिता से कहता है कालेज जाऊँगा तो केवल बाईक से. और बाईक में डबल (तेज बजता है) होरन होना चाहिए, रोड़ पर चलते हुए यदि जरूरत नही भी है तो आप को बताने के लिए कि उन के पास बाईक है और यह सडक हमारी है. आप पीछे हटो, और जान बुझ कर बिना कारण होरन बजाते हुए आप की तंद्रा भंग करते हुए आगे निकलने का प्रयास करेंगें और वह चाहे बायें से या दायें से निकल ही जाएंगे और आप बच सको तो बच जाओ वर्ना इस तरह छेड़े जाओगें जैसे किसी लड़की को छेड़ रहा हो – ओ अंकल दिखता नही है क्‍या, घर से लड़ कर आये हो इत्‍यादि साथ में बोनस में दो गाली भी सुनने को मिल जाएगी.

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अब आप कितनें ही खिलाड़ी रहे हों इनको पकड़ पाना आपके बुते की बात नहीं है.

अब इन को कौन बताएं कि कभी हम भी जवां थे. ये बचे-खुचे बाल तो केवल धूप मे ही सफेद हुए है.

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और गलती से कोई लड़की अकेली जाती मिल गई तो जनाब की स्‍पीड इतना धीरे हो जाएगी कि लकुटी हाथ में उठाए अंकल भी उससे तेज भागते नजर आएंगें ।

 

इसलिए ट्रेफिक पुलिस को सुझाव है कि ऐसे बाइकरों की गति पर विराम लगानें के लिए मैडम तुसाद से हसीनाओं के पूतले बनवा कर हर 100 मीटर पर स्‍थापित कर दिएं जाएं. इससे होगा दोहरा फायदा भीड़ भरी सड़क पर ट्रेफिक बहुत सहज हो जाएगा.

 

खैर अब तो आदी हो गया हूँ ओ अंकल दिखता नही है क्‍या? सुनने का, यदि किसी दिन ये शब्‍द ना सुनाई दिए तो रातों की नींद उड़ जाती हैं.



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
September 22, 2010

प्रिय श्री जोशी जी, टीआरपी से नींद उड़नें तक रचना रचनें में लगता है आपकों मजा आने लगा है । प्रस्‍तुति लाजबाव है । अंकल दिखता नहीं है क्‍या … की टिप्‍पणी वास्‍तव में सुननें की आदत सी हो गई है । अरविन्‍द पारीक

    deepak joshi के द्वारा
    September 22, 2010

    भाई जी को मेरा सादर प्रणाम, भई मान गए आप की नजर को सही पकडा है। अब एक ऐसी लो सी लगी है देखिये कब तक जलती है। धन्‍यवाद

आर.एन. शाही के द्वारा
September 20, 2010

बहुत बेहतरीन और सार्थक प्रस्तुति दीपक जी … बधाई ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 20, 2010

    आदरणीय शाही जी, उत्‍साहवर्धक टिप्‍पणी के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

chaatak के द्वारा
September 20, 2010

स्नेही जोशी जी, ध्वनि प्रदूषण और किशोरों के अन्दर बढती अशिष्टता दोनो ही गंभीर मुद्दे हैं परन्तु ये धीम ज़हर शायद हमने ही फैलाया है कुछ तो खामियाजा हमें भुगतना ही होगा| हाँ आपका एक दर्द (धूप में बाल सफ़ेद होने वाली) श्रध्येय केशव जी ने कुछ इस तरह उकेरा था (आपकी शान में पढ़ रहा हूँ)- उजले उजले सब भले, उजेल भले न केश, नारी नवै न रिपु डरे न आदर करैं नरेश, ‘केशव’ केशन अस करीं, जस कोई रिपु न कराहीं, चन्द्र-बदन, मृग-लोचनी बाबा कहि-कहि जाहिं|| एक सामयिक समस्या को मंच पर रखने पर बधाई!

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 20, 2010

    प्रिय चातक जी,धन्‍यवाद, भई मान गए आप के जवाब देने का अंदाज एवं जो आप ने हमारे सजदे में कसिदे पढे़ है। तथापि में तो यही कहूंगा कि – नारी को संग साथ है। शुत्र डरते मोसे, सफेद बालन और चॉंद देख गदद-गदद भये गोरे। आपकी उत्‍साह वर्धक टिप्‍पणीयों की सदा आपेक्षा रहेगी। दीपक जाशी

R K KHURANA के द्वारा
September 20, 2010

प्रिय दीपक जी, ठीक कहा है आपने ! कई लोगों को बेवजह ही हार्न बजने की आदत होती है ! उनको यह दिखाई भी दे रहा होता है की आगे रास्ता नहीं है फिर भी हार्न बहाए जायेंगे ! जैसे आग बुझाने जाना हो ! खुराना

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 20, 2010

    आदरणीय खुराना जी, आप ने एक दम सही तुलना की है इन रथ सवारों की – यह शोर इतना मचाते है कि जैसे आग बुझाने जाना हो ! धन्‍यवाद

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 19, 2010

बहुत बढ़िया……….. दीपक सर …………. आपका लेख वाकई बहुत बढ़िया है………. ये सब तो बढ़िया है पर मैडम तुसाद से हसीनाओं के पूतले बनवा कर हर 100 मीटर पर स्‍थापित कर दिएं जाएं इस विचार पर थोडा असहमत हूँ ऐसे तो ये सड़क चलते की बलि उस मूर्ति को चढ़ा देंगे……… इस पर एक मार्मिक कहानी मैंने लिखी थी…… अगर आप चाहें तो पढ़ें………… http://piyushpantg.jagranjunction.com/2010/08/13/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B8%E0%A4%9C%E0%A4%BE/

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 19, 2010

    प्रिय पीयूष जी, लेख पर आप की प्रोत्‍साहन वर्धक प्रतिक्रिया अच्‍छी लगी। धन्‍यवाद, मैं आप की कहानी अवश्‍य ही पढूंगा। दीपक जोशी

abodhbaalak के द्वारा
September 19, 2010

दीपकजी, आईडिया तो बहुत अच्छा है बाइकरस की स्पीड कम करने की, के हर सौ मीटर पर मैडम तुसाद से बनवा कर हसीनाओं के पुतले लगवा दिए जाए. वात ऐन आईडिया सर जी! आजकी एक ज्वलंत समस्या पर बहुत सुंदर लेख, बधाई हो

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 19, 2010

    प्रिय अबोध जी, सराहना के लिए बहुत-2 धन्‍यवाद। दीपक जोशी

Ramesh bajpai के द्वारा
September 19, 2010

अंकल दिखता नही है क्‍या, घर से लड़ कर आये हो इत्‍यादि साथ में बोनस में आदरणीय श्री जोशी जी यह जुमला सिर्फ दिल्ली का नहीं रहा . हम भी अपने शहर में इसी तरह नवाजे जाते है है . उस दिन दो हीरो इसी तरह कैची मार कर निकले और आगे जाकर फिसल कर गिर पड़े

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 19, 2010

    प्रिय रमेश बाजपेयी जी, धन्‍यवाद, आप ने ठीक ही कहा है यह आज के समाज की ताजा तस्‍वीर है। पर भई इन लड़को की तारिफ भी करनी चाहिए कम से कम यह तहजीब से अंकल तो कहते है।


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