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बेगानो की शादी और अब्दुल्ला दीवाना

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भाई पाठकों यह पंक्‍तियां कही सुनी थी पर मतलब तो मैं भी नहीं जानता हूं। पर शायद यही हमारी दिल्‍ली की शान में कही जाए तो सटीक उतरती है। क्‍योंकि दिल्‍ली में जो गेम-शेम का माहौल बना हुआ है चारो तरफ रोनक-शौनक देखने को मिल रही है जैसे शादी से पहले लड़की वालों के घर में साफ-सफाई, घर की मरम्‍मत, घर में सफेदी एवं पेंट किया जाता है, घर के बाहर बिजली की लडि़यॉं आदि लगाई जाती है। वही हाल हमारी दिल्‍ली का भी है।

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भई यह एक शादी ही तो है। हॉ, इस पर हमारे खेल मंत्री श्री एम.एस. गिल जी ने भी तो कहा ही था कि यह कॉमनवेलथ खेलों का आयोजन भी तो एक लड़की की शादी के आयोजन जैसा ही है। पर हमे तो देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि यह कुछ इस तरह का विवाह-स्‍वयंवर का आयोजन हो रहा है जहां दरजनों देशों से राजकुमार आ रहे है।

 

जगह-जगह नवनिर्माण, नई सड़के, पुल, मैट्रो, नये फुटपाथ और रोड़ के बीचों-बीच एवं फुटपाथों के साथ-साथ पेड़ लगा कर दिल्‍ली कि छवि ऐसी कर दी है कि भई हर रोज उसी सड़क से निकलने वाले भी यह छटा देख कर हैरान हो जाते है कि यह वही रास्‍ते हैं। जगह-जगह सड़कों पर, जहॉं-जहॉं मेहमानों कि नजर जायेगी या जिस रास्‍ते का वह लोग प्रयोग करेंगें, सड़कों पर नये डिजाईन कि विदेशी बल्‍ब वाले खंबे लगाए गए है और तो और लाल बत्तियों पर भी डिजाईनर खंबों पर नई लाल बत्तियां लगाई गई हैं, पहले एक खम्‍बे पर तीन या चार लाईट होती थी (लाल, ओरंज व हरी एवं दाऐं मुड़ने के लिए एक अतिरिक्‍त) पर अब तो एक लम्‍बे खंबे पर तीन-तीन लाईटें लगाई गई है, भई क्‍यों न हो दिल्‍ली मे कोई बिजली की कमी थोडी न है।

traffic lights

भई एक और तारीफ की बात है कि पुलों एवं मैट्रो के निर्माण के लिए हजारों पेड़ों को बलि देने के बाद अब चेती दिल्‍ली सरकार ने जगह-जगह पेड़ लगाने के आदेश दे दिए है। अब हमारी दिल्‍ली (केवल नई दिल्‍ली) हरित प्रदेशों में शामिल हो जाएगी।

 

और तो और भई जहां गरीबी, कुड़ा करकट दिख भी रहा है वहां व्‍यू कटर (शेरा एवं खेलों के बड़े-बड़े पोस्‍टर) लगा कर, जैसे टाट पर पैबंद लगा कर उसे ढका जा रहा है।

 

भई एक बात और मजे की है इस गेम-शेम के चक्‍कर मे पता नहीं हमारे मीडिया वालों को दिल्‍ली सरकार ने या केंद्र सरकार ने क्‍या गेरू खिला दिया है कि उन की तो आवाज ही बैठ गई है। बहुत सी खबरें जो जन मानस को दिखाई दे रही है पर वह आज कल छोटे पर्दे से नदारद हैं।

 

भाई जैसा कि आप लोगों को तो पता ही है शादी वाले घर में काम तो बारात के आने के समय तक भी चलता ही रहता है। वही हाल हमारी दिल्‍ली का भी है 21/9/10 को एकाएक निमार्णाधीन उपरगामी पुल जो खिलाडि़यों के इस्‍तेमाल के लिए ही बनाया जा रहा था, गिर गया और 25 मजदूर घायल हो गए।  

 collapse bridge

     बात आती है अब घर आने वाले अति‍थियों की सुरक्षा की, हम कोई सुरक्षा-विशेषज्ञ तो है नहीं पर नजर अपनी-अपनी ख्‍याल अपना-अपना। हमारी नजर से देखें तो जब तक चोर, डकैतों और आतंकवादियों को इलाके में खाकी वर्दी वाले दिखाई देते है तब तक वह उस जगह आने का साहस नहीं करते है। और जो जगह खाली मिलती है वहॉ वारदात करके चले जाते हैं।

 

     दिल्‍ली कि एक पुरानी तस्‍वीर है। जब भी कोई वारदात की सूचना मिलती है तो जगह-जगह पुलिस वाले रोड़ पर बैरियर लगा कर बैठ जाते है जैसे चुहे को फांसने के लिए पिंजरे लगाए जाते है। भई अब तो चुहे भी बहुत समझदार हो गए है वे रोटी देखकर भी पिंजरे में नहीं आते और आप इन आतंकवादियों और बदमाशों को इन बैरियर लगा कर कहॉं तक रोक पाएंगे ।

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     लेकिन हमें देखिए हम फिर भी खुश हैं कि शायद भविष्‍य में हमारी दिल्‍ली पेरिस या लंदन बन जाएगी ।

 

दीपक जोशी 



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

omprakash pareek के द्वारा
September 28, 2010

जोशीजी, दिल्ली दिल वालों की है मगर इन खेलों ने दिल्ली का दिल तोड़ दिया. काश इतनी तकलीफें नहीं होती तो बेहतर था . काफी पहले जागरण जंक्सन में मेरी एक कविता ब्लागंकित हुई है सो आपके अंतिम para में लन्दन- पेरिस देखा तो मुझे अपनी कविता की यह पंक्तियाँ याद आई . दिल्ली अब न्यूयोर्क बनेगी , मेट्रो के कन्धों पर चढ़ के …………………..etc खैर आपका सारा केखन अच्छा है और प्रतिक्रियाएं भी ढेर सारी मिल रही हैं oppareek43

deepak joshi के द्वारा
September 26, 2010

आदरणीय शाही जी, धन्‍यवाद, यदि मेरी प्रस्‍तुतियों से आप दिल्‍ली के प्रति अकर्षित हो रहे है तो यह मेरा सौभाग्‍य है, दिल्‍ली की तो बात ही निराली है। यदि इतिहास में झांके तो देखेंगे जो दिल्‍ली आया वो दिल्‍ली का ही होकर रह गया। आप की टिप्‍पणी के लिए एक बार पुन: धन्‍यवाद।

sunilrathore के द्वारा
September 25, 2010

joshi g, hindi men type nahi kar paata lekin aapke lekh ko padhkar kuch kehne ka man huya hai isliye yahan kuch kahoonga,shayad hamari sarkar nahi janti ki gandagi ke upar kapda failane se gandagi ti dab jaayegi lekin badboo nahi, photo men barrior ke upar bandar nahi hai asal men woh hamari sarkar hai.lekh bahoot achha hai

    deepak joshi के द्वारा
    September 26, 2010

    प्रिय सुनील जी, आप का दिल से शुक्रिया जो आपने इस लेख को सराहा। आप ने सही कहा है गंदगी पर कपड़ा ढकने से उस की बदबू कम नही होती, पर इन नेताओं मे तो 5 मे से दो इंद्रियां (नाक एवं कान) काम ही नहीं करती। और रही बैरियर पर बैठे बंदर की तो मै इस छवी से दिल्‍ली पुलिस कि मुस्‍तैदी ब्‍या करना चाहता था पर आप ने तो इस फोटो का सही अर्थ निकाल दिया – प्रगति पर रोक बैरियर पर बैठी सरकार।

आर.एन. शाही के द्वारा
September 25, 2010

दिल्ली के बारे में सुना था कि बड़ी बेदिल है । लेकिन आपकी प्रस्तुतियों से दिल्ली से कुछ लगाव सा होता जा रहा है दीपक जी … बधाई ।

Arvind Pareek के द्वारा
September 25, 2010

प्रिय श्री जोशी जी, बेगानो की शादी में अब्दुल्ला दीवाना का यदि आपको मतलब पता नहीं होता तो क्‍या आप इतना बेहतरीन लिख पाते और साथ में आपकी बात का समर्थन करते चित्र इसके कलेवर को और निखार रहे हैं । एक अच्‍छी पोस्‍ट के लिए बधाई । अरविन्‍द पारीक

    deepak joshi के द्वारा
    September 25, 2010

    प्रिय अरविंद जी, भई हम आप की लेखनी और पोस्‍टों का जवाब देने का जो अंदाज है उस के कायल तो हम पहले से ही थे पर बातों से बातों का मंत्‍वय निकालना कोई आप से सीखे। धन्‍यवाद दीपक जोशी

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 24, 2010

आदरणीय दीपक जी…………. हर बार की तरह इस बार फिर आप एक अच्छे लेख से छा गए…….. हार्दिक बधाई…………..

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 25, 2010

    प्रिय पियूष जी, आप का यह दो टूक शब्‍दों में प्रोत्‍साहन देना ही हमे आगे लिखने को बाध्‍य करता है। धन्‍यवाद

Ramesh bajpai के द्वारा
September 24, 2010

आदरणीय श्री जोशी ..[...जी भई एक बात और मजे की है इस गेम-शेम के चक्‍कर मे पता नहीं हमारे मीडिया वालों को दिल्‍ली सरकार ने या केंद्र सरकार ने क्‍या गेरू खिला दिया है कि उन की तो आवाज ही बैठ गई है। बहुत सी खबरें जो जन मानस को दिखाई दे रही है पर वह आज कल छोटे पर्दे से नदारद हैं।] बहुत बहुत बधाई . इतनी गुदगुदाती पोस्ट के लिए

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 24, 2010

    क्षमा करे क्रपया” जोशी जी” ‘ पढ़े जी शब्द कोष्टक में चला गया

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 25, 2010

    आदरणीय श्री रमेश बाजपेयी जी, त्रुटियों पर नजर नहीं जाती केवल दिल से निकलते भावों को ही यहां महसूस किया जाता है कि पाठक का लेख के प्रति क्‍या नजरीया है। उत्‍साह वर्धक टिप्‍पणी के लिए धन्‍यवाद।

daniel के द्वारा
September 24, 2010

आदरणीय दीपक जी ! हास्य का पुट रखते हुए आपने, अपने मन कि बात कितनी सहजता पूर्वक कह दी है !! ब्लॉग लेखन में आप काफी परिश्रम करते है, ब्लॉग में आपने ४ तस्वीरें डाली है, लेख में मुझे अशुद्ध शब्द भी दिखाई नहीं दिए आपका परिश्रम वाकई सराहनीय है……………… ..

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 25, 2010

    प्रिय श्री daniel जी, क्षमा चाहूंगा आप के नाम का सही उच्‍चारण न कर पाने के कारण आपका नाम अंग्रेजी में लिखा है आप की सराहना के लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद।


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