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दायरा ..........

Posted On: 28 Sep, 2010 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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दिल मेरा पंछी सा है पर पालतू बना पिंजरे में हूं

चाहता हूं रोज उड़ना पर दायरा सीमित सा है

दिल तो करता है रोज उडूं और चोंच मारूँ जगह-जगह

उन्‍मुक्‍त उडूं इन हवाओं में और रोज बदलूं दायरा

केवल झांक लेता हूं पिंजरे से मैं क्‍योंकि दायरा जो सीमित सा है

बस झांक लेता हूं इन उन्‍मूक्‍त कोकिलों को राह चलते कनखियों से मैं

याद करता हूं जवानी के उन पलों को जो आए और चले गए

सन अब स्‍याह हुए और नेत्रों को सहायक मिल गए

जींस और टी-शर्ट पहन संवरना चाहता हूं मैं

इस नए जमाने के फैशन में मैं भी गुम हो जाना चाहता हूं

देखता हूं जब इन कोकिलों को टाईट टॉप और जींस में

उफ सा कर जाता हूं मै इस नए से फैशन को देख मैं

पर्दा लज्‍जा सब खत्‍म हुई आंचल का दायरा बदल गया

चुन्‍नी को हटा अब सूट से इस नए फैशन की दौड़ में

टी-शर्ट को सहारा बना लिया।

इस नए जमाने के फैशन ने हम बुढों को भी बदनाम किया

खुली किताबें देख हमें भी पढ़ने को बाध्‍य किया

पर अपनी वय एवं चरण-पदुकाओं की बौछारो के डर से चुप होके रह गया

भूल के सब ख्‍वाब अब वास्‍तविकता में आकर रह गया

ख्‍वाबों से निकल अब पुन: अब उसी डाली पर आकर बैठ गया

अपने घर को बदल न पाया और युग परिवर्तन पर निकल पड़ा ।

दिल मेरा पंछी सा है पर पालतू बना पिंजरे में हूं

चाहता हूं रोज उड़ना पर दायरा सीमित सा है ।

 

दीपक जोशी



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43 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
October 2, 2010

प्रिय ए.बी.सी. जी, भाई साहब आप ने अपना नाम क्‍यें छुपाया यह मै समझ नही पा रहा हूं, चलिए कोई बात नहीं आप की प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
October 2, 2010

प्रिय निखिल जी, आप की उत्‍साह वर्धक प्रतिक्रिया के लिए पुन: धन्‍यवाद और आपके विशवास एव आस्‍था को कायम रखने का पूरा प्रयास करूंगा। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

abc के द्वारा
October 2, 2010

गुड कम्पोज़ीशन। नाईसली सूट्स टू ओल्ड मैन्स साईको। गुड पोएम। कंगरचूलेशनस।

Arvind Pareek के द्वारा
October 1, 2010

प्रिय श्री जोशी जी, स्‍नेही श्री चातक जी ने लगता है आपसे किनारा कर रखा हैं । अन्‍यथा कविता प्रेमी चातक जी यहां टिप्‍पणी ना दे ये हो ही नहीं सकता । मैं यही समझ रहा था कि उनकी प्रशंसा के कारण आप इतनी सीढि़यां चढ़ रहे हैं । खैर ज्‍यादा चर्चित की सूची में आने की बधाई । ये कहीं आदरणीय शाही जी के ज्ञानी जी का कमाल तो नहीं हैं । वैसे शाही जी ने मुझसे वादा किया है कि वे लैपटॉप लेकर मेरी मदद अवश्‍य करेंगें । कहीं आपनें उन्‍हें आते-आते रोक लिया हो । भई आपके इस दायरे में कैद हो गए तो बाकी सब का क्‍या होगा । अरविन्‍द पारीक

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 1, 2010

    प्रिय अरविंद जी, लगता है ब्‍लॉग की सभी पोस्‍टों पर आप की पेनी नजर रहती है आप दिन में एक आध बार सभी प्रेमी लोगों की ब्‍लॉग एक बार जरूर खंगाल लेते हैं, तभी तो आप ने जाना की चातक जी की कोई प्रतिक्रिया हमें नहीं मिली। भाई साहब चातक जी की लोकप्रियता से प्रेरित हो कर ही तो हमने भी कुछ जुमले जोड़ने की कोशिश की और पर पता नही चला की कैसे इस कविता का जन्‍म हुआ। भई लगता है चातक जी हमारी किसी बात पर हमसे खफा है़, यदि पता चले तो हम माफी भी मांग लें। और बात रही चर्चित की सूची में आने की तो भाई यह सब आप सभी लोगों का एक सम्मिलित प्रयास ही कहूंगा कि आप लोगों ने मेरी लेखनी को सराहा तभी मै आज इस पायदान पर पहुंच पाया हूं। मै आप सभी पाठकों का तहे दिल से शुक्र गुजार हूं और भविष्‍य में भी आप सभी से ऐसी प्रतिक्रियांओं की आपेक्षा करूंगा। अब रही बात शाही जी के ज्ञानी जी की, तो भाई साहब तो इस विषय में में केवल यही कहूंगा की अभी सारे कार्ड मत खुलवाएं, इब्‍तदाए इश्‍क है रोता है क्‍या आगे आगे दे‍खीये होता है क्‍या। रही बात अब शाही जी एवं आप के प्रेम की तो भाई साहब, यह तो हम भी जानते है कि शाही जी और आप के संबंध हमसे भी पुराने है, और हमारी क्‍या बिसात के हम इस में रोड़ा बने। अरविंद जी यहां एक और याचना करना चाहूंगा कि शाही जी से थोडि सिफारिश हमारी भी कर दिजिएगा कि एक दो बार मेरी किसी पोस्‍ट पर भी अपने लैपटौप का कमाल दिखा दें शायद हम भी कुछ ऊंची उड़ान उड़ पाएं। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 1, 2010

आदरणीय जोशी जी , कुछ रचनाये ऐसी होती है जो रोज की आपाधापी भरी जिंदगी में एक ताजगी देती ठहराव सी होती है .. ये कविता भी कुछ ऐसी ही है ..कितनी सुन्दर अभिव्यक्ति है… व्यंग्य है ,,तीखा कटाक्ष है और सीख भी है इस नए जमाने के फैशन ने हम बुढों को भी बदनाम किया खुली किताबें देख हमें भी पढ़ने को बाध्‍य किया .. बेहतरीन और वास्तविकता को दिखाती रचना जहा तक वर्मा जी की बात है तो उन्हें ये ही कह दीजिये……… दिल तो बच्चा है जी .. थोडा कच्चा है जी लेकिन सच्चा है जी………..

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 1, 2010

    प्रिय निखिल जी, भई हम ने आप की अभी एक ही पोस्‍ट पढ़ी थी, और हमें आप की लेखनी ने आप को प्रतिक्रिया देने को बाध्‍य किया। हमे अच्‍छा लगा आप को हमारी यह कविता पंसद आई। पर सच्‍चाई यही है कि हम ने भी यह पहली बार कुछ जुमले जोड कर अपने मन की बात कहने का प्रयास किया इस में चातक जी की भी कविताओं से भी कुछ लिखने को प्रोत्‍साहन मिला है और यह मेरी प्रथम कविता है, सराहना के लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 1, 2010

    क्या बात है … अगर ये पहली कविता है ..तो यक़ीनन इसमें अनुभव और बदलते समाज पर गहरा अध्ययन काम आया है……………. एक बात आपसे जरुर कहना चाहूँगा की की लेख और व्यंग आसानी से लिखा जा सकता है पर कविता लिखना सामान्य नहीं होता कविता वही कर सकता है जिसकी निगाह दुसरो के शारीर नहीं मन के भीतर तक टटोलने की क्षमता रखती हो… मै आपको बताऊ …. की मेरी पहली कविता तो बहुत ही सर दर्द थी ….मुझे आपकी रचना पड़ते वक्त ऐसा कभी नहीं लगा की की पहली रचना है………….. मेरा विचार है की आप जरुर पहले रचना करते रहे होंगे लेकिन उसे अंतर्मन के दायरे में सीमित रखा होगा… उससे कलम और पन्नो तक नहीं लाया होगा… अब आपसे विनम्र निवेदन है की उस दायरे से बहार निकले ताकि हम जैसे पाठको को कुछ और बेहतरीन रचनायो का स्वाद मिले… शुभकामनाये

V.K. Garg के द्वारा
October 1, 2010

प्रिय मित्र दीपक ये लेखनी का भूत कब से आप पर सवार है । कल ही बिष्‍ट से पता चला कि जोशी जी भी लेखक बन गए हैं । इसलिए आज नेट पर आकर बैठ गया । श्री पशुपतिनाथ से दायरा तक का आपका सफर बहुत रोचक लगा । यह देखकर बहुत खुशी हो रही है कि आपके चाहनें वालों का दायरा भी इस दायरे के साथ बढ़ रहा हैं । इस टिप्‍पणीयों के समुह में सभी ने जो नेक सलाह दी है मैं उसे नहीं दोहराऊँगा । क्‍योंकि पता है जनाब बाज आने वाले नहीं हैं । लेकिन मित्र अगली पोस्‍ट की प्रतीक्षा अवश्‍य रहेगी । बधाई इसी तरह लिखते रहना । विनय कुमार गर्ग

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 3, 2010

    प्रिय विनय भाई, धन्‍यवाद यह तो हमारे अहो भाग्‍य जो आप ने हमारी लेखनी को पढ़ा एवं सराहा, भाई देरी से जवाब देने के लिए माफी चाहता हूं दो दिनों से कंम्‍पयूटर खराब था, कुछ विन्‍डोज एक्‍सपी भी तंग कर रहा था, रिपेयर करने के बाद ही बैठ पाया हूं। आप आज शाम 3/10/10 को ही मेरी अगली पोस्‍ट पढ़ सकते है। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

B.L. VERMA के द्वारा
September 30, 2010

जोशी जी, आप दायरे में रहते रहते भी भटक जाते है पर फिर भी लौट कर उसी डाली पर आ जाते है। भाई साहब यह उमर अब भटकने की नही है बल्‍कि भटको को समझाने की है। पर कहूंगा की आज के युवा चाहे वह लड़की हो या लड़का अपनी पुरानी संस्‍क़ति को भूल कर अब पता नही किस दौड़ में शामिल होती जा रही है। आशा करूंगा कि आप भविष्‍य में भी ऐसी प्रेरणा प्रद संदेश हमारे समाज को देते रहें।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 2, 2010

    प्रिय बी.एल. वर्मा जी, आप की नसीहत सर आखों पर और भाई साहब आप ने सही कहा है। पर आप तो जानते ही है कि उमरे दोरा मांग कर लाऐ थे चार दिन, दो आरजू में कट गए दो इंतजार में। भई बाल सफेद हुए तो क्‍या हुआ दिल तो काला है। भटक जाता है पर फिर भी है तो दायरे में ही। प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद। दीपकजोशी63

रामेश्‍वर पाठक के द्वारा
September 30, 2010

दिल मेरा पंछी सा है पर पालतू बना पिंजरे में हूं चाहता हूं रोज उड़ना पर दायरा सीमित सा है । आपके इस दुख पर कि आप पंछी का दिल लेकर पालतू बने पिंजरे में है और रोज उड़ना चाह कर भी उड़ नहीं पाते हैं तो मन उदास होना चाहिए था लेकिन ना जाने क्‍युँ चेहरें पर हंसी आ गई । वाकई सीमित दायरे की इस कविता में असीमित संभावनाएं है । रामेश्‍वर पाठक

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 30, 2010

    प्रिय रामेशवर पाठक जी, प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद और आप ने सही ही कहा है कि इस कविता में सीमित दायरे के होते हुए भी असीमित संभावनाएं है, क्‍योंकि इंसान का दिल और उसका मन दोनों आपस में द्वंद करते रहते है एक भागता है एक उसे पकड़ कर रखता है, और यही इस पंछी रूपी दिल का दायरा है।

Vivek Verma के द्वारा
September 30, 2010

जोशी जी आपका दायरा तो बहुत बड़ा है क्‍योंकि दिल्‍ली जैसे शहर में ही खुली किताबें ज्‍यादा हैं । गांव व देहात में ऐसा सौभाग्‍य कहां.  ये सब ख्‍वाब हैं और आप वास्‍तविकता में लौट आए हैं जानकर कुछ दुख भी हुआ । अमां मियां पिंजरें में कैद है तो क्‍या जब मौका मिले उड़ान भर लेनी चाहिए । आप बहुत अच्‍छा लिख रहे हैं. बस इसी प्रकार आपकी लेखनी कहूँ या की बोर्ड कहूँ की झलक देते रहिए ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 30, 2010

    प्रिय विवेक वर्मा जी, आप की प्रोतसाहन वर्धक प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद, पर भाई साहब बाल सफेद हुए तो क्‍या हुआ दिल तो चंचल है वह कई बार अपना दायरा छोड़ भटक ही जाता है। और आप को एक बार पुन: धन्‍यवाद कहुंगा कि आप ने शायद मेरी और भी पोस्‍ट पढ़ है तभी आप को पता चला के मै दिल्‍ली से हूं। मै आप की आशा अनुसार आगे भी कुछ अच्‍छा ही लिखने का प्रयास करूंगा और आप से इसी प्रकार प्रोत्‍साहन की उमिद रखूंगा। दीपकजोशी63

kmmishra के द्वारा
September 28, 2010

जोशी जी नमस्कार, अब आपका दायरा बढ़ कर पूरा अखिलविश्व हो गया है । ब्लागिंग के पर लगाकर आपकी कलम देश विदेश में विचरण कर रही है । सुंदर और हृदयस्पशी कविता के लिये आभार ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    प्रिय मिश्रा जी, बहुत ही अल्‍प शब्‍दों में मेरे दायरों का दायरा जो आप ने बढ़ा दिया उस के लिए मै आप का आभारी हूं। सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद। दीपकजोशी63

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
September 28, 2010

आदरणीया खुराना जी, आप का इस मंच से यह अल्‍प अवकाश हमें बहुत अखरा, पर देख रहा हूं की आप लौटे हें तो पहले से कही युवा होकर क्‍योंकि सत्तर का हुआ तो क्या हुआ, अभी तो मैं जवान हूँ। भाई साहब आप के आगे तो हमारी जवानी भी फीकी पड़ गई। सरहाना करने का यह नया स्‍टाईल हमें आप का कायल बना गया ।

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 28, 2010

इस नए जमाने के फैशन ने हम बुढों को भी बदनाम किया खुली किताबें देख हमें भी पढ़ने को बाध्‍य किया अति सुन्दर ……………. एक नया रूप…………. अच्छा लगा………..

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    प्रिय पीयूष जी, अब सभी पन्‍ने आप लोगों के सामने खोले दिये है। भाई घर पर मत शिकायत कर देना वरना यही पंछी बेघर हो जाऐगा। धन्‍यवाद। दीपकजोशी63

rajkamal के द्वारा
September 28, 2010

बस झांक लेता हूं इन उन्‍मूक्‍त कोकिलों को राह चलते कनखियों से मैं याद करता हूं जवानी के उन पलों को जो आए और चले गए sir ji …दूर क्यों जाते है …आप अपनी जवानी को अपने बच्चो में …और बचपन को अपने पोतों में पायेंगे …. और हाँ .. अगर आपके पास पैसा है तो किसी कमसिन कोकिल को अपने करीब पायेंगे ..जो करेगी आपके शीघ्र मरने की दुआ फिर परिवार को और चैन को अपने पास नहीं पाएंगे .. खैर मजाक जो भी हो … अब सीरिअसली कहता हू …. बहुत ही अच्छी कविता लिखी आपने … अगर कभी जवानी में भगवान पे गलती से कुछ लिक डाला हो तो उससे हमको भी रूबरू करवाईए…. धन्यावाद …

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    प्रिय राजकमल जी, धन्‍यवान जो आप ने इन शब्‍दों से इसे पोस्‍ट को नवाजा, भई आप को अगली पोस्‍ट धर्म पर ही मिलेगी। सराहना के लिए पुन: धन्‍यवाद।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    प्रिय राजकमल जी, यदि आप देखें तो मेरी पहली पोस्‍ट श्री पशुप‍ितिनाथ जी पर ही है जिस से प्रेरणा पा कर मै इस मंच पर स्‍वयं को काबिज कर पाया हूं। यह श्री पशुपतिनाथ जी की ही महीमा है जो मै आज यहां इस मंच पर ठहर पाया हूं। दीपकजोशी63

R K KHURANA के द्वारा
September 28, 2010

प्रिय दीपक जी, आपकी अन्य रचनायों से हट कर यह रचना है ! जवानी की चुटकी ली है आपने ! पुराने दिनों की यादें भूलती नहीं ! मुझे सबसे अच्छी लाइन लगी : – “पर अपनी वय एवं चरण-पदुकाओं की बौछारो के डर से चुप होके रह गया” भैया चुप रहोगे तो बचे रहोगे चुप रहना ही ठीक है ! मैंने अपनी रचना “अभी तो मैं जवान हूँ” में यह दो लाईने लिखी थी वही यहाँ दे रहा हूँ “बच कर वार करना मुझ पर, मैं भी तीर कमान हूँ, सत्तर का हुआ तो क्या हुआ, अभी तो मैं जवान हूँ ! राम कृष्ण खुराना

    Deepak Joshi के द्वारा
    September 29, 2010

    आदरणीया खुराना जी, आप का इस मंच से यह अल्‍प अवकाश हमें बहुत अखरा, पर देख रहा हूं की आप लौटे हें तो पहले से कही युवा होकर क्‍योंकि सत्तर का हुआ तो क्या हुआ, अभी तो मैं जवान हूँ। भाई साहब आप के आगे तो हमारी जवानी भी फीकी पड़ गई। सरहाना करने का यह नया स्‍टाईल हमें आप का कायल बना गया ।

subhash के द्वारा
September 28, 2010

shoch ke pinjre se bahar nikal aaj ka aanand lijiye badlav hi jindgi hai

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    प्रिय सुभाष जी, इस दोरे उम्र के सफर मे हमारा लौटना अब संभव नही, हां नजरों का पेट भर जाऐ यही काफी है मेरे लिए। दीपकजोशी63

roshni के द्वारा
September 28, 2010

दीपक जी आज तो सब आधुनिकता के नाम पर अपने दायरे cross कर रहे है… .. आधुनिकता का अनुसरण करती युवा पीढ़ी पर अच्छी कविता .. बधाई मेरी तरफ से

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    रोशनी जी, हमारे दुख में शरीक होने के लिए आप का बहुत-बहुत धन्‍यवाद। दीपकजोशी63

Arvind Pareek के द्वारा
September 28, 2010

प्रिय श्री जोशी जी, किसके पिंजरें में कैद है । मुझे तो आप इस मंच के उन्‍मुक्‍त आकाश में उड़ते नजर आते हैं । मात्र 6 पोस्‍टों पर शतक की और बढ़ रहे है आप । लाजबाव कविता । मैं आदरणीय शाही जी व वाजपेयी जी के विचारों से सहमत हूँ । लेकिन ईश्‍वर से रक्षा की दूआ नहीं करूँगा क्‍योंकि आपनें बाल धूप में थोड़ी सफेद किए हैं । अरविन्‍द पारीक

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    प्रिय अरविन्‍द जी, हौसला अफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया, भाई हम सामाजिक दायरे के पिंजरे में कैद है, पर मन में उठे बुलबुले आप को सुना दिए तो कुछ हद तक उठता ज्‍वार कम हो गया। अब आप और डेनियल जी भी शाही जी तरफ मिल जाऐगें यह हमने नहीं सोचा था। और भई साहब अब तो बाल कहां अब तो हम बॉल्‍ड हो गए है।

Tufail A. Siddequi के द्वारा
September 28, 2010

दीपक जी अभिवादन, ….”चुन्‍नी को हटा अब सूट से इस नए फैशन की दौड़ में टी-शर्ट को सहारा बना लिया। इस नए जमाने के फैशन ने हम बुढों को भी बदनाम किया खुली किताबें देख हमें भी पढ़ने को बाध्‍य किया”…. आपने कुछ पंक्तियों के माद्ध्यम से जिस प्रकार बिगडती सांस्कृतिक सभ्ह्यता पर कुठाराघात किया है, वह सराहनीय है. सुन्दर रचना. बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    आदरणीय तोफेल जी, आप ने कविता का मर्म समझा एवं उसे सराहा आप का बहुत बहुत शुक्रिया। अब यह आधुनिकता की होड़ में कही अब हम उम्र दराजो को भी आखों पर पटटीयां न बांधनी पड़े। और गाहे-बघाऐ शर्मसार होना पड़े। धन्‍यवाद दीपकजोशी63

आर.एन. शाही के द्वारा
September 28, 2010

होशियार दीपक जी, यह उम्र 17-18 वाली से ज़्यादा खतरनाक़ होती है । हमें अब आपकी चिन्ता करनी चाहिये । जो अक्स आपकी आँखों में दिख रहे हैं, उनपर चोंच मारना खतरे से खाली नहीं । ईश्वर रक्षा करें । मज़ेदार और फ़्रेश करने वाली पोस्ट … बधाई ।

    daniel के द्वारा
    September 28, 2010

    जोशी जी की कविता से ज्यादा मज़ा तो आपकी उस चुटकी में आया जो आपने उन्हें काटी है !!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    September 28, 2010

    धन्यवाद डैनियल जी, दीपक जी के जवाब की प्रतीक्षा है । अब उधर से नज़रें हटें तो शायद हम पर भी नज़र पड़ ही जाएगी ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    आदरणीय शाही जी, भाई आप बडे़ भाई है यदि हम भटके भी तो रास्‍ता आप ही सुझाऐगे। इस नए फैशन के भंवर से हमरी नाव आपही निकालें गे। धन्‍यवाद

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    प्रिय डेनियल जी, आप भी बड़े भाई के साथ मिल कर चुटकियों का आन्‍नद उठा रहें है। जब हमारी उम्र तक पहुंचेगे तो पता चलेगा के न सावन हरे न भादो सुखे, चोंच तो बिलकुल बंद हो जाती है और यदि देखते रहने की क्षमता है तो केवल देखीये वरना आंखे बंद कर लिजिए या मुंह मोड लिजिए। सरहाना देने की अदा पसन्‍द आई।

abodhbaalak के द्वारा
September 28, 2010

दीपक जी, मन कभी बूढा नहीं होता, शरीर बूढा होता है, वास्तव में आजके समय में, हम जो चारो ओर देखते हैं तो सोचने पर विवश हो जाते हैं की , क्या हम वास्तव में भारतीय हैं, आजे बड़े बड़े महानगरो में हो हो रहा है वो जगजाहिर है, इसके लिए संभवतः हम सब ही दोषी हैं पता नहीं ये सामाजिक बदलाव हमारे लिए लाभदाई है या ….. सुन्दर कृति के लिए बधाई हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    प्रिय अबोध जी, आप का कहना बिलकुल सही है, आज का युवावर्ग इस कलयुगी नदी के बहाव में ऐसा फंस गया है कि उस वेग ने वह सभी दायरे खत्‍म कर दिए है। और समय कहता है आप यदि नदी की धारा से डरते हो तो अपनी नांव को किनारे-किनारे हे खे लो वरना डूब जाओगे। धन्‍यवाद दीपकजोशी63

Ramesh bajpai के द्वारा
September 28, 2010

दिल तो करता है रोज उडूं और चोंच मारूँ जगह-जगह उन्‍मुक्‍त उडूं इन हवाओं में और रोज बदलूं दायरा आदरणीय जोशी जी मानवीय जीवन के स्वाभाविक अहसासों को जीवंत द्रष्टि से देखती व सामाजिक मर्यादा को खोखला करते बदलाव के नए मानदंडो पर प्रहार करती पोस्ट पर किन शब्दों से आभार लिखू … बस यही शब्द … बहुत खूब

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 28, 2010

    आदरणीय बाजपेयी जी, धन्‍यवाद, आप के इन बेशकीमती आलंकरणों को मैं सजो कर रखुंगा, और यही मुझे आगे भी कुछ लिखने की प्रेरण देगें।


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