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बातें जो रह गई याद

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विषय की खोज........

Posted On: 3 Oct, 2010 Others में

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भई पाठकों मेरी छठी पोस्‍ट को ब्‍लॉग पर प्रकाशित करने के बाद मै सोचने लगा, भई दीपक जी आप का आगे का भविष्‍य क्‍या है। छ: पोस्‍ट लिखकर यह जो अल्‍प लोकप्रियता अर्जित कि है क्‍या यह प्रशंसाओं का काउंटडाऊन यहीं पर रूक जाऐगा। क्‍या आप के पास अब कोई नया मसाला या चटपटा कहने को बाकी न रहा, हमने अपने दिमाग के पिंजरे को बहुत खंगाला पर कोई ऐसा मसाला नही मिला।

 

अचानक हमारे शैतानी दिमाग में एक विचार आया कि यह जो अरविंद पारीकजी है इन्‍होंने इतनी लोकप्रियता जो प्राप्‍त करी है कोई खुद के दिमाग से थोडे ही करी है। जरूर यह सब भाई जी के कारण है। और यह जो हमेशा कहते रहते है कि व्‍यस्‍तता के कारण जवाब देने मे देरी होती है कारण मुझे समझ आ गया। जरूर यह नये विषयों कि खोज में भाई जी के द्वार पर पड़े रहते होगें की कही कोई नया विषय मिले और लिख डाले।

 

भई प्रसिद्धी की चाहत में अंधे हो हम भी भाई जी के घर कि ओर चल पड़े, फिर बुजुगों की कहावत याद आई के भाई किसी के घर पहली बार जाते हैं तो खाली हाथ नही जाते, और हम तो कुछ पाने के लिए जा रहे थे तभी हमे घ्‍यान आया कि भई जब श्री राम को भी केवट ने बिना कुछ लिए नाव पर नहीं चढने दिया जो क्‍या बिना रिश्‍वत के भाई जी हमें कोई ज्ञान कैसे देंगें, तो भाई मिठाई कि दुकान से आधा किलो पेड़े लिए और हम पहुंचे भाई जी के डेरे पर, एक साधारण एवं सुन्‍दर सा घरौंदा था उनका। हमें देखते ही पहचान गए, और बोले भई दीपकजोशी63 बहुत अशिकाना मिजाज रखते है, भई दायरे में रह कर भी नजरे बहुत चलती है आपकी। हम थोड़ा सकपका गये, और लजाते हुए कहा, भाई जी बात वह नहीं है अब आप तो जानते ही है यदि फिल्‍म में थोडा ग्‍लेमर न हो तो फिल्‍म कौन देखेगा। 

 

तो वो तपाक से बोले क्‍या राजकपूर के पदचिन्‍हों पर आप भी चल पडें है क्‍या। तो हम हाथ जोड कर बोले हमारी ऐसी हैसियत कहाँ, और हमारी आने की मंशा पुछी।  हमने पेड़े का डिब्‍बा आगे करते हुए कहा बस आप से आर्शीवाद लेने आए थे।  तो बोले भई बिना आर्शिवाद के ही छ: पोस्‍टों पर शतक लगा लिया है धोनी और वीरू को भी शतक तक पहुंचने में कई मैच खेलने पड़े, और क्‍या चाहते हो। हमारे दिमाग के चैनल पर पूरी फिल्‍म चलने लगी। यह सब अरविंद पारीकजी की कारगुजारी है सुबह शाम की खबर इन्‍हें देते रहते है।

 

हमने कहा भाई जी, अब यह ब्‍लॉग की दुकान तो लगता है यही बंद होती नजर आ रही है। तो बोले क्‍यों भई कुछ नया परोसिये, तो हमने कहा जमा पुंजी तो खर्च हो गई अब तो न दिमाग में न कलम मे कुछ नही बचा। जो भी चर्चित विषय थे जैसे राम नाम, अयोध्‍या, कश्‍मीर, कृष्‍ण, कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, कॉमनवैल्‍थ खेल आदि सभी विषयों पर तो ब्‍लॉगरों ने उन्‍हें ब्‍लॉक कर दिया है जैसे के उन का कापीराईट अब उन के ही पास हो। अब हम ने तो लेखन की दुनिया में नया-नया पदार्पण किया अब लिखूँ भी तो किस पर। तो कुछ सोच कर बोले एक बात कहूं, तेरी हालत पर तरस खाकर एक गुरू मंत्र दे रहा हूं पारीकजी को मत बताना । इतना कह भाईजी ने एक दरी बिछा कर पूछा, ‘शीर्षासन करना जानते हो ?’ मैंनें हॉं में गर्दन हिला दी। वे बोले, ‘फिर देख क्‍या रहे हो जरा पोजिशन ले लो’। मैं हक्‍का बक्‍का था। आया था विषय की तलाश में लेकिन यहां आसन दिखानें पड़ रहे हैं। इधर-उधर नजर दौड़ाई, कहीं कोई छूपा कैमरा तो नहीं है । दरअसल लुँगी पहने ही चला आया था । मन में एक संशय और था कि इससे विषय की तलाश कैसे पूरी होगी । लेकिन फिर सोचा अरविंद पारीकजी जब भाईजी पर इतना विश्‍वास कर तृतीय पुरस्‍कार पा सकते हैं तो क्‍या मैं कुछ नहीं सीख सकता । और सिर के बल शीर्षासन की मुद्रा में खड़ा हो गया ।

भाईजी ने पुछा, ‘बोलो, क्‍या दिख रहा है?’ मैं इसके अलावा और क्‍या कहता कि अब तो सब कुछ उल्‍टा-पूल्‍टा हो गया हैं। मेरे इतना कहते ही भाईजी बोले, ‘बस यही तरीका है विषय को तलाशनें का, जो कुछ सीधे-सीधे दिखता है उस पर कभी मत लिखों। जो दिखता है उससे उल्‍ट ही लिखों । जैसे कश्‍मीर में आतंकवादी सभी को बुरे दिखते हैं आप उन्‍हें अच्‍छा बताते हुए लिखों या गाड़ी तेज दौड़ानें पर लिखो, रेड लाईट जंप करने के फायदे लिखों, नियमों को तोड़नें का आनंद लिखों और कुछ ना मिलें तो दूसरें ब्‍लॉगों को पढ़ों और चार पॉंच को मिला कर अपना ब्‍लॉग लिख डालों…..।’ भाईजी लग रहा था चुप ही नहीं होगें। मैं सीधा होकर, उन को प्रणाम कर दरवाजे की ओर लपका और बाहर आ गया।

 

भाई जी कि नसीहत पर अपने सिर को धुनते हुए, चलते-चलते मैं, पनवाड़ी की दुकान पर आ रूका। चौरसिया जी की दुकान पर पान खाने वालों कि भीड़ ज्‍यादा ही रहती है कारण कुछ उन के पान लगाने का तरीका व कुछ उनका किसी न किसी विषय पर चुटकी लेना, वह तो मात्र चुटकी लेकर पान लगाने लगते है और वहां पान खाने आए लोग उन विषयों पर अपनी राय मशवरा देने लगते है और वह मशवरा धीरे-धीरे एक बहस का रूप ले लेती है चाहें वह खेल हो, पोलिटिक्‍स या किसी हारी-बीमारी पर। हमारा पान भी बन गया और पान की गीलोरी मुहं में दबाते हुए हम घर की ओर चल पड़े और उस पान के स्‍वाद से ही हमारे चक्‍शु खुले तो लगा कि यही एक ऐसा मंच है जहां विषय जन्‍म लेते है। और चर्चा में आते है। कोई भी नया विषय पकड लो और लिखो।

 

भई अपनी सफलता पर खुश हो हमने घर की राह पकड़ी।



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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

raziamirza के द्वारा
October 30, 2010

सुन्दर मनभावक लेख | आपको विषय की कमी कैसे हो भला ? कलम चली और विषय बन गया|

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 30, 2010

    रजिया जी धन्‍यवाद, बस कुछ आप जैसे पुराने ब्‍लॉगरों को पढ़ कर एक राह हम ने भी पकड़ी है देखिये कितनी दूर तक चल पाएंगे। प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद। .दीपकजोशी63

तफहीम खान के द्वारा
October 7, 2010

भाई जोशी जी विषय तो बताङए अब किस पर लिखऩा है

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 7, 2010

    प्रिय तफहीम खान जी, भाई साहब विषय ही की तो खोज चल रही है, आप की दोनों पोस्‍ट पढ़ी बहुत ही मार्मिक हैं आप पर जो बीती उस का दर्द आप के शब्‍दों में भी ब्‍या होता है और आप का सफरनामा (दुसरी पोस्‍ट)। को पढ कर तो रोंगटे ही खड़े हो जाते है कि किस हाल में आप ने वह वक्‍त काटा है। आप जिन परेशानियों के सैलाब को तैर कर निकल गए वर्ना कोई और होता तो आज भटक जाता। किन्‍तु एक शिकायत है कि शायद आप ने गल्‍ती से प्रतिक्रियां प्राप्‍त करने को ब्‍लॉक कर दिया है। बहुत बहुत धन्‍यवाद जो आप ने प्रतिक्रिया लिखि। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

daniel के द्वारा
October 4, 2010

*बहुत सुंदर* **बहुत सुंदर** ***बहुत सुंदर*** व्यंग की दुनियां की बेताज बादशाह को मेरा प्रणाम !

kmmishra के द्वारा
October 4, 2010

आदरणीय जोशी जी सादर वंदेमातरम ! आप हिंदी में ब्लागिंग कर रहे हैं और हिंदी को समृद्ध कर रहे हैं इसके लिये आभार । ब्लागिंग की दुनिया अभी खुली ही है । यहां अभी बहुत ढेर सारी संभावनाएं हैं । आपका जो प्रिय विषय हो । जो जानकारी आप देना चाहते हों, आपके जो अनुभव हों, काम की बातें, बच्चों, युवाओं, वृद्धों के लिये । यानी की पूरी दुनिया खुली है आपको लिखने के लिये । आप यह मत सोचें कि आप ब्लाग लिख रहे हैं आप सोचिये कि आप चाय की दुकान पर बैठे हैं और अपना मत रख रहे हैं या दोस्तों से गप्पिया रहे हैं । लिखिये आनंद आयेगा । आभार ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 4, 2010

    प्रिय मिश्रा जी, वंदेमातरम, भाई साहब आप ने तो हमारी सोच एवं खोज को एक नया आयाम दे दिया है। भाई साहब वह तो जो लिखा है मात्र पाठकों का मनोरंजन मात्र है, व्‍यंग के माध्‍यम से — बातें सबके साथ, बाते जो रह गई याद। आपकी सलाह पर अमल जरूर करूंगा, धन्‍यवाद। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
October 3, 2010

प्रिय निखिल जी, आप भी मजे की मिठाई मुफ्त में खा रहें हैं। भाई जिस पर पड़ती है उसे ही पीड़ा का अहसास होता है। यहां तो लुंगी में देख भाईजी ने हमसे शीर्षासन करवा दिया, अब आप को भी यदि मिलने की चाहत है तो भाई जरूर मिल कर आईये। और भाई रही बात विषयों की तो भाई यह अहसास तो आप को भी होगा कि कितना आकाल पड़ गया है। भई सुनें सब की करें अपने मन की। देखते है कुछ नया विषय इस दिमाग रूपी डब्‍बे से बाहर आता है तो जल्‍द ही परोसेगें। प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद।

rajkamal के द्वारा
October 3, 2010

अजी साहब …हमने माना की महंगाई बहुत ही ज्यादा हो गई है …. तो इस सारी कहानी का लब्बोलुआब यह है की आप आधी कीमत पे पूरी सलाह की चाह अगर रखेंगे .. तो जनाबे आला ! हाल तो हर बार ऐसा ही होगा … अगर अगली बार ऐसी फजीहत से बचना चाहते है तो जेब को ढीली करके पूरे एक किलो पेडो की गुरु दक्षिणा अर्पण करे …. और अगर नतीजे सकारात्मक ना हो तो मेरी पूंछ या सींग पकड़ लेना

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 4, 2010

    प्रिय राजकमल जी, आप के मश्‍वरे के लिए धन्‍यवाद, अव्‍वल तो जल्‍दी अब भाई जी के यहां जाना नहीं पड़ेगा पर यदि गए भी तो किलो मिठाई के बिना नही जाएंगे।

abodhbaalak के द्वारा
October 3, 2010

दीपक जी, यही कह सकता हूँ की मज़ा आया पढ़ कर, भाई जी से लगता है की हम को भी मिलना ही पड़ेगा, अगर हो सके तो कृपया उनका पता ही भेज दें ताकि हम भी किसी तरह से अपनी लेखनी को सुधर सकें. http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 3, 2010

    प्रिय अबोध जी, आप हमारी रामकथा पढ कर ही मजे ले रहे है और हम विषय की खोज मे पापड़ बेल रहे है। चलिए इसी बात पर हम आपको सच्‍चाई ब्‍यां करने के लिए धन्‍यवाद करते है। भाई जी का पता है दिल की खोली, प्रेम गली, दिल्‍ली-420, पर जरा संभल कर जाना। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

Ramesh bajpai के द्वारा
October 3, 2010

आदरणीय श्री दीपक जी देखिये आदरणीय श्री पारीक जी ने शीर्षासन आपसे करवाया यहाँ उल्टा हम लोगो को दिख रहा है कही पेड़ो में कुछ मिला तो नहीं था ? और आदरणीय शाही जी लुंगी की बुराई क्यों कर रहे थे ? उनके यहाँ कब जा रहे है यह इशारा है .

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 3, 2010

    आदरणीय बाजपेयी जी, भाई साहब कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता है पर हमें क्‍या पता था भाईजी हमसे शीर्षासन करवा लेंगें। भाई साहब सही कहा गया है किसी भी चीज की जल्‍दबाजी अच्‍छी नहीं, हम जाना तो शाही जी के ज्ञानी जी के पास चाहते थे पर दूरी के कारण दिल्‍ली में ही भाईजी के यहां पहुंच गए। अब शाही जी से उन का पता पूछ कर उनके भी दर्शन करने पड़ेगें। प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद।

roshni के द्वारा
October 3, 2010

दीपक जी अच्छा लेख पर अब हम आपके नए विषय को पढने के लिए उत्सुक है …… तो कब आ रहे है आप नया विषय लेकर ??

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 3, 2010

    रोशनी जी, धन्‍यवाद, आप लोगों का प्रोत्‍साहन इसी तरह मिलता रहना चाहिए, और बहुत ही जल्‍दी एक नई रचना के साथ हाजिर होता हूं।

Aakash Tiwaari के द्वारा
October 3, 2010

आदरणीय दीपक जी…. बहुत ही अच्छा लगा मजा भी आया पढ़कर ….. आकाश तिवारी

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 3, 2010

    प्रिय आकाश जी, धन्‍यवाद, भाई साहब इस मंहगाई में मजा ही तो एक ऐसी चीज रह गई है जो मुफ्त में मिल जाती है और इस भागती दौड़ती जिंदगी में कुछ सुकुन दे जाती है।

आर.एन. शाही के द्वारा
October 3, 2010

भई दीपक जी, इसे संजोग कहें या आपकी दिल्ली से लगाव, कि जैसे ही आप खिड़की पर प्रकट होते हैं, मुझसे नज़रें चार हो जाती हैं । आज भी आपको सबसे पहले मुझे ही देखना लिखा था । यह जानते हुए भी कि एक बार अन्तर्ध्यान होने के बाद आप फ़िर जल्दी नमूदार नहीं होते, फ़्री में वोट डाल दे रहा हूं । आगे से भाई जी के यहां लुंगी में मत पहुंच जाया कीजिये, बुरी बात है । बधाई ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    October 3, 2010

    लीजिये साहब, नज़र लग भी गई आपकी । शायद मैं और निखिल जी साथ-साथ ही लिख रहे थे । उनकी टिप्पणी पहले पोस्ट हो गई ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 3, 2010

    आदरणीय शाही जी, हमने तो जब भी पाया है आप को खिडकी (internet) पर ही बैठे पाया है, भाई साहब इस दौर में अब आप का खिड़की पर बैठना अच्‍छा नही हम जैसे बच्‍चों पर गलत असर जाता है। चांद के दीदार को आप बैठे थे आस लगाए, पलकें थकी और आप से पहले कोई और (निखिल जी) बाजी मार ले गया। भाई जी भी पहुंचे हुए खिलाड़ी है शायद लुंगी देख कर ही शीर्षासन करवा दिया, पर आगे से आप की सलाह पर हमने लुंगी में गाठ लगा ली है हमेशा ध्‍यान रहेगा। वोट देने के लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 3, 2010

    आप साहेबान से विनम्र अनुरोध है की खिडकियों पे न बैठे … नहीं तो हम लोगो पर बुरा असर पड़ेगा……और फिर ये ठीक भी नहीं लगता … क्योकि तब हमलोगों को आप लोगो का लिहाज करके खिड़की से हटना पड़ेगा,… इससे बढ़िया है आप ही लोग हटे और जगह दे…………और शाही जी खिड़की पे बैठे रह गए मै सीधा छत पे पहुच गया तभी चाँद को पहले ही देख लिया … और हा कृपा करके भाई जी तक खबर पंहुचा दे की उनका इंतज़ार हो रहा है जल्दी दर्शन दे

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 3, 2010

प्रणाम सर……………… इसका मतलब आपकी और भाई जी की मुलाकात मजेदार रही और इसका मतलब जल्द ही हमें कुछ हटके मिलेगा पढने को… ..भाई जी से लगता है हम सभी को कुछ आशीर्वाद लेना चाहिए.. वैसे ये विचार मेरे मन में आया था की भाई जी से मिलु लेकिन सोचा कही पारीक जी का कॉपी राइट भाई जी पे भी न हो…. क्या किया जाये विषयो का अकाल तो है क्योकि मंच पर बहुत बेहतरीन लेखक आ चुके है और कोई विषय आप सोचे लिखने को तबतक उसपे पारीक जी मिश्र जी , मनोज जी , वाजपेयी जी शाही जी .. अनीता जी चातक भाई और भी कई लोग पहले से ही पब्लिश्ड मिलते है.. अगर आप वहा से खुश होकर लौटे है तो इसका मतलब कोई जबरदस्त विषय मिल गया है आपको .. इंतज़ार में हम बैठे है ..


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