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बिन फेरे हम तेरे.....

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बिन फेरे हम तेरे….. जी हां जनाब लिव-इन-रिलेशनशिप का हिन्‍दी में सही अनुवाद तो यही हो सकता है । एक लड़का और एक लड़की या एक मर्द और एक औरत बिना शादी किए साथ-साथ पति-पत्नि की तरह एक साथ रह सकते है जिसे हमारे समाज ने कानूनी मान्‍यता मिल जाने के कारण स्‍वीकार कर लिया है । इसे लिव-इन-रिलेशनशिप न कह कर पंजाबी का साझां चुल्‍हा भी कह सकते है। भई, जब तक मन आए साथ साथ रहें, जब मन भर जाए तो अलग हो जाएं।

 

भई यह आधुनिकता की दौड़ को देख कर ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि हम एक तरफ तो कहते है कि समाज में मर्यादा का पालन हो, परंपराओं – प्रथाओं की अनदेखी न हो, शादी के बाद पति एवं पत्‍नी किसी दुसरे के बारे में न सोचे, विवाहोत्तर संबधों को गलत ठहराया जाता है लेकिन आज यह लिव-इन-रिलेशनशिप शब्‍द इसे कानुनी जामा भी पहना रहा है ।

 

हर कानून हर नियम के दो पहलू होते है किसी हद तक तो वह सही होते है और उन्‍हें जायज ठहराया जाता है। किन्‍तु मानव जाति एक ऐसा प्राणी है जो उस के गलत पहलू को पहले खोजता है। जिसे रोकने के लिए ही शायद सुप्रीम कोर्ट को आगे आकर जीवन निर्वाह भत्‍ते के विषय में एक कानून पास करने की जरूरत पड़ी।

 

मैं कहना चाहता हूं कि एक तरफ हम शादी से पहले प्‍यार करने को गलत ठहराते है यदि लड़के-लड़कियां गले में बाहें डाले पार्को में घुमते है तो वह गलत है। यदि लड़कियां शादी से पहले किसी लड़के से शारीरिक संबंध बना ले तो उसे हमारा समाज कभी भी स्‍वीकार नहीं करता। और अब उस ने इन्‍हें यह लाईसेंस दे दिया है कि बेटा/बेटी जब तुम 21/18 के हो जाओं तो जो दिल में आए करो तुम आजाद हो। अब तुम पर समाज का एवं परिवार का कोई भी अंकुश नहीं है।

 

मेरे एक दोस्‍त का भांजा जो ग्‍वालियर का रहने वाला है, सोवियत रूस से डॉकटरी कर के दिल्‍ली लौटा और दिल्‍ली में रह कर वह अपनी आगे की पढ़ाई कर रहा है। रूस में ही उस के साथ पढ़ने वाली उस की एक सहपाठी जो कि हिन्‍दुस्‍तानी है और लखनऊ की रहने वाली है वह भी उसी के साथ एक ही घर में एक ही छत के निचे साथ-साथ रह रहे है। अब परिवार वालों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए है यह कह कर की भई लड़का पढ़ लिख गया है अब वह ज्‍यादा समझदार हो गया है। उस की जैसी इच्‍छा। मतलब अब हम ने यहां क्‍योंकि हमारे ऊपर बीत रही है तो समय से समझौता कर लिया है।

 

यदि सही कहें तो आज समय एवं वातावरण को देख स्‍वंय को इस में ढाल लिया है। तथा साथ में यह तर्क भी पेश करते है कि भई यह एक बुखार है समय रहते उतर जाएगा। यदि नहीं उतरा तो तुम जानों। यानि हमने अब इस नए संबंध को भी मंजूरी दे ही दी क्‍योंकि यह समय की मांग है।

 

पहले हमने गे–संबंध को ऐसी मंजूरी दे दी यह कह कर की यह समाज की आज की जरूरत है। फिर अब बिन फेरे हम तेरे ……. और आगे क्‍या हम वाईफ स्‍वैपिंग या हस्‍बैंड स्‍वैपिंग और इससे भी आगे जिगालो को भी इस समाज में किसी मजबूरी के तहत मंजूरी दे देगें।

 

इस समाज के बदलते कानूनों के लिए एक सवाल खड़ा हो गया है ….. आगे क्‍या ?

 

दीपक जोशी



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39 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sjsingh के द्वारा
November 27, 2010

अगर बच्चे हुए तो वाप के कालम में किसका नाम लिखा जाऐगा .. 

raziamirza के द्वारा
October 30, 2010

सब से पहले तो आपकी कमेन्ट के लिए बहोत आभार| और कमेन्ट की पगडण्डी पर चलते चलते ही आप के ब्लॉग तक आ पहुची हु| मैं इसे एक खामोश रिश्ता कहना चाहूंगी| बिन फेरे हम तेरे….. ग्रेट aarticle

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 30, 2010

    रजीया जी, आदाब, भई बहुत ही सही शब्‍दों में आप ने प्रतिक्रिया दी है और इस (बिन फेरे हम तेरे….) को एक खामोश रिश्‍ता कह कर। धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
October 28, 2010

प्रिय श्री दीपक जोशी जी, समाज की आज की जरूरत तो बहुत कुछ है । कानून व सरकार उसे क्‍या-क्‍या देंगें । भयावह भविष्‍य से परिचय करवानें के लिए धन्‍यवाद । नौ पोस्‍ट पर दौ सौ टिप्‍पणियां ही बता रही हैं कि आपका लेखन पसंद किया जा रहा है । मेरी दोहरे शतक पर बधाई । अरविन्‍द पारीक

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 28, 2010

    प्रिय अरविन्‍द जी, भई प्रतिक्रिया देना तो कोई आप से सीखे, चार लाईनों में सभी कुछ कह गए। लगता है बहुत जल्‍दी में हैं। हॉ भई एक लम्‍बे अवकाश के बाद आप का इस ब्‍लाग पर आगमन जो हुआ है। धन्‍यवाद।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 30, 2010

    प्रिय अरविंद जी, आप का प्रतिक्रिया देने का अंदाज बहुत ही ला जवाब है दो शब्‍दों में ही सारी बाते कह गए। इसे देख कर ऐसा लगता है जैसे आटो में बैठ कर कही जा रहे है रास्‍ते पर ध्‍यान कम और आटो के मीटर पर ध्‍यान ज्‍यादा है। प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

    Arvind Pareek के द्वारा
    November 1, 2010

    प्रिय श्री दीपक जोशी जी, बात आटो पर नहीं तो साईबर कैफे के मीटर की है । लेकिन पेंच यही है कि सब कुछ जल्‍दी-जल्‍दी निपटाना पड़ता है । मुझसे बेहतर तो आपकी जानकारी है । अरविन्‍द पारीक

Alka r Gupta के द्वारा
October 27, 2010

दीपक जी,आपके ब्लाँग पर देर से आने के लिए क्षमा चाहती हूँ बहुत ही महत्त्वपूर्ण  बात की है आपने , पर समय रहते बुद्धि के द्वार खुल जाएँ तोबहुत ही अच्छा हो लेकिन  अगर देरी ह्ई तब तोअनर्थ ही हो जाएगा,फिरउसके लिए कानून का दरवाज़ा खटखटाना  पड़ेगा। लेख के लिए बधाई

    deepak joshi के द्वारा
    October 28, 2010

    अलका जी, प्रणाम देर से ही सही पर आप की अमूल्‍य प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। देखीये यह प्रेम प्‍यार सब ऐज फैक्‍टर है। कई बार परिस्थियों वश भी न चाहते हुए उस में फंस जाते है। किन्‍तु यदि कोई बडे बुजुर्ग इस विषय में सलाह देते है तो उन की बाते भी हमें सोचनी चाहिए, और यह बात भी नहीं है कि हर एक के साथ गल्‍त हो किन्‍तु नेगेटिव फैक्‍टर को पहले सोचना आज के परिवेश मे जरूरी है कि अगर ऐसा हुआ तो क्‍या होगा ………….

Amitkr Gupta के द्वारा
October 26, 2010

आदरणीय जोशी जी ,आपने अति महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया हैं. अच्छा लेख. http://www.amitkrgupta.jagranjunction.com

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 27, 2010

    प्रिय अमित कुमार गुप्‍ता जी, प्रितिक्रिया देने के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

roshni के द्वारा
October 26, 2010

दीपक जी मेरे ख्याल से कानून बने या बने.. ये सही है ये गलत है …… बात ये मायने रखती है की औरते इसे किस तरह स्वीकारती है … क्या वोह इस को लेकर खुशी होती होगी.. नहीं वोह सोचती होगी की उन्हें भी आधुनिक हो जाना चहिये क्युकी भाई ये तो कानून है …….. सबसे पहले तो इस कानून की जरुरत ही क्या थी? ये समझ नहीं आता …. और महिला जो बिन फेरे हम तेरे में विश्वास रखती है बहुत ही काम होगी या न के बराबर होगी………. और जो ४-५ होगी वोह भी कभी न कभी पछताती ही है .. क्युकी एक समय बाद तो पुरुष दूसरी शादी कर लेगा मगर वोह महिला न घर की रहती है न घाट की……… इस कानून को मान्यता देने से तो अच्छा था जो लोग इस तरह साथ रहे उन्हें सजा दी जाये…….. शादी की ………

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 27, 2010

    रोशनी जी, देर से प्रतिक्रिया देने के लिए माफी चाहता हूं, आप ने सही ही कहा है, आज खास कर लड़कीयों को तो अपनी मर्यादा में रह कर चलना चाहिए क्‍योंकि इस आधुनिकता की होड़ में कही वह कोई गल्‍त कदम उठा ले और बाद में लौट न पाएं उस से पहले ही संभल जाएं। प्रति्क्रिया देने के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

samta gupta kota के द्वारा
October 26, 2010

जोशी साहब,विषय पर आपने अच्छा लिखा,मूल समस्या तब पैदा होगी जब संबंधों के फलस्वरूप संतान के जन्म के बाद लड़का-लड़की पूरी गैर-जिम्मेदारी से इस सम्बन्ध से बाहर हो जाएँ,और कोई भी संतानों की जिम्मेदारी निभाने को तैयार न हो तो उनकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 27, 2010

    समता जी, अधिक तो मै भी नही जानता पर इसी ब्‍लॉग पर एक ब्‍लॉगर है, श्रध्‍येय श्री के.एम.मिश्रा जी, जो पेशे से एक वकील भी है। उन्‍होंने हमारी (मेरे और अन्‍य ब्‍लागरस) की जानकारी के लिए बताया है कि – आदरणीय जोशी जी आपको और दूसरों को जानकर बड़ी हैरानी होगी कि कानून और अदालतें नैतिकता को कानून के दायरे में नहीं मानती हैं इसीलिये लिव इन रिलेशन शिप और होमोसेक्सुएलटी जैसे मामलों पर अदालतों की राय भिन्न होती है । तो समता जी बात यहां आती है हम या आप तो सामाजिक पहलू पर इस तरह बात कर रहें है जैसे कि सब्‍जी मार्किट में मिल गए। और लगे बतियाने। सब के पिछे कानून भी तो है आखिर। अच्‍छी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

Ramesh bajpai के द्वारा
October 26, 2010

आदरणीय श्री जोशी जी बहुत ही संवेदन शील मुद्दा उठाया है आपने .इस सामाजिक यंत्रणा को मै क्या कहू ? इन संबंधो को एक जज महोदय ने श्री कृष्ण व राधा के दिब्य व ,वासना रहित संबंधो से जोड़ दिया है . खैर अभी ये आग आम घरो में नहीं लगी , इस लिए हो सकता है की लोग अभी इस पर चर्चा न करे पर …………….

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 26, 2010

    आदरणीय वाजपेयी जी, प्रणाम, आप ने सही ही कहा है कि - जज महोदय ने श्री कृष्ण व राधा के दिब्य व ,वासना रहित संबंधो से जोड़ दिया है। क्‍योंकि वह भी एक पिता है और पिता होने के नाते उन्‍होंने इस पर कानूनी जामा पहना दिया है। किन्‍तु हमारे आज के युवा इस के सही पहलू को न देख कर गल्‍त पहलू पर पहले झुकते है। प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63 .

    sjsingh के द्वारा
    November 27, 2010

    जज जी ने पुराने इतिहास का जो हवाला दिय़ा , क्या हम हर गलत वात को ज्ञायज ठहरा सकते हैं, ऐक जज से इस तरह की टिप्पणी, समाज को कौन वचायेगा,,

आर.एन. शाही के द्वारा
October 26, 2010

दीपक भाई आपने सही मुद्द उठाया और श्रद्धेय मिश्रा जी से इसके विधिक पक्ष की जानकारियां भी प्राप्त हुईं । आपने उदाहरण में जिस रूस रिटर्न जोड़े का ज़िक्र किया है, लगभग उन्हीं परिस्थियों में ये रिश्ते दिख रहे हैं, बाक़ी सब अभी पूर्ववत ही चल रहा है । चिन्ता का विषय तब होगा जब महानगरों से उतर कर यह पद्धति छोटे शहरों और गांव-कस्बों में उतर आएगी । तब संस्कृति पर एक और कुठाराघात अवश्यंभावी होगा । मां-बाप दहेज़ से बचने के लिये इसको बढ़ावा देना शुरू कर देंगे । साधुवाद ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 26, 2010

    आदरणीय शाही जी, प्रणाम आप का कहना कहीं हद तक सही है किन्‍तु हम भारतीय लोग पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति को बहुत ही तेजी से अपनाते जा रहे है। आज का युवा तो आंखों पर पट्टी बांध कर पाश्‍चात्‍य की दौड में शामिल हो रहा है। डर इसी का है कि हम लोग अपनी संस्‍कृति को छोड दुसरे की संस्‍कृति को अपनाने में ज्‍यादा गर्व महसूस करते है उस का कारण है अपनी स्‍वार्थ सिद्धी। प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद।

K M MIshra के द्वारा
October 25, 2010

आदरणीय जोशी जी, प्रणाम । आपने लिव इन रिलेशन पर अच्छी जानकारी दी है । लिव इन रिलेशन को कानूनी समर्थन तब तक ही प्राप्त है जब तक दोनो पक्ष अविवाहित हैं । यदि दोनो में से कोयी भी पक्ष किसी दूसरी औरत या मर्द से पहले से ही विवाहित है तब फिर यह लिव इन रिलेशन की श्रेणी में नहीं आयेगा बल्कि यह व्यभिचार होगा और तमाम कानूनों की धाराओं के विपरीत जा कर एक अपराध का रूप धारण करेगा । अभी इस मुद्दे पर बहुत बहस होनी है । इसके सामाजिक पक्ष पर प्रकाश डालने के लिये आभार ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 26, 2010

    प्रिय मिश्रा जी, प्रणाम, हम से ज्‍यादा कानूनी पहलू तो आप को पता होगा किन्‍तु मैने मात्र आम आदमी के मस्‍तिष्‍क में उठने वाले सवालों एवं आगे आने वाले कल के परिणामों के विषय को हि लिखा है। क्‍या यह सही नहीं है कि आज कानून भी समाज की गलत मांग के आगे झुकने लगा है। एक अच्‍छी प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

    K M MIshra के द्वारा
    October 26, 2010

    आदरणीय जोशी जी आपको और दूसरों को जानकर बड़ी हैरानी होगी कि कानून और अदालतें नैतिकता को कानून के दायरे में नहीं मानती हैं इसीलिये लिव इन रिलेशन शिप और होमोसेक्सुएलटी जैसे मामलों पर अदालतों की राय भिन्न होती है । ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 27, 2010

    श्रध्‍येय श्री मिश्रा जी, एक अच्‍छी जानकारी के लिए धन्‍यवाद। आप की बात 16 आने सत्‍य है कि …… सामाजिक पक्ष पर प्रकाश डालने वाली ……………. कानूनी पहलू बहुत गुढ़ है जिन से आम आदमी अन्‍भिज्ञय होता है ………………. कचहरी एवं क्‍लांईटों के बाद ब्‍लॉग के लिए इतना समय निकालना तारीफ के काबिल है। धन्‍यवाद

daniel के द्वारा
October 25, 2010

नमस्कार दीपक जी ! मुझे केवल इतना ही कहना है कि हमारे बहुत से भाई बहन पाश्चात्य देशों में जाकर बस गए है ! सेक्स की दृष्ठि में बहुत ही खुले वातावरण में रहने के बावजूद भी अनेक परिवारों के युवाओं ने अपने आप को इस खुले पन से बचा कर रखा है , आने वाले समय में यह उन्मुक्त वातावरण हमारे यहाँ और फैलेगा और बहुत से लोग इसके प्रभाव में आ जायेंगे ! लेकिन मुझे विश्वास है कि हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग इस से बचा रहेगा, अपने प्रयास/ चिंताओं से नहीं केवल और केवल परमेश्वर कि इच्छा व् अनुग्रह के द्वारा !! ***शुभकामनाएं ***

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 26, 2010

    प्रिय डेनियल जी, आप के विचार मात्र एक मन को झुठी संतावना देना मात्र है। हम भारतीयों की यही एक प्रवृति है की हम अपनी संस्‍कृती को छोड़ आज पाश्‍चात्‍य की बाढ़ में बहे चले जा रहे है और जिस में हमे हमारा स्‍वर्थ नजर आता है उसे हम पहले अपनाते है उस का परिणाम यह है कि हम भी अब पाश्‍चात्‍य ही हो गए है। आगे जो परमेश्‍वर की इच्‍छा। धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

October 25, 2010

आदरणीय दीपक जी …….. पुरुष प्रधान समाज का पुरुषों के पक्ष में होना कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है………. इस प्रकार के किसी भी सम्बन्ध में हमेशा महिला ही कष्ट भोगती है……. और पुरुष अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला छुड़ा लेता है….. अच्छा लेख हार्दिक बधाई………..

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 26, 2010

    प्रिय पियूष जी, मै आप की बात से सहमत नही हूं क्‍योंकि जब कीचड़ में पत्‍थर गिरता है तो कीचड़ चारो तरफ उछलती है ऐसा नहीं है कि मात्र महिला ही कष्‍ट भोगती है, पुरूष भी उस से अछुता नहीं रह जाता क्‍योंकि वह भी तो समाज से जुड़ा हुआ है। प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद।

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 25, 2010

जोशी जी अभिवादन स्वीकार करे …. यह विषय लगभग हर मंच पर उठ चूका है लेकिन समय के साथ जैसे आपके मित्र ने हाथ खड़े कर दिए है सभी ने वही करना होगा क्योकि परिवर्तन की अपेक्षा हम केवल दुसरो से रखते है .खुद माँ बाप ही बच्चो को पश्चिमी कुए में धकेलकर आत्ममुग्ध बने फिरते है और बच्चे जब ऐसे कदम उठाते है तो वह उसी भौतिक भूख की उनके अनुसार पराकाष्ठ होती है जिसके बीज बचपन में ही पड़ चुके थे …. अब अगर हम बच्चो को राम की जगह टॉम बनने की शिक्षा देंगे तो परिणाम तो यही होगा…. हा जहा तक परिणाम की बात आपने कही है तो ..इसका परिणाम एक जबरदस्त अराजक समाज और अवसाद ग्रस्त मानवता के रूप में आएगा… ..क्योकि आंकड़े बताते है की जो अमेरिका आज मानवीय संबंधो में खुलेपन के बारे में सबसे आगे है वह महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधो में भी सबसे आगे है …. ड्रग्स , हथियार ,, वैश्यावृति .इत्यादि में सबसे आगे ये देश सबसे खुलेपन का नाटक दिखाते है … वे अपना अवसादी भूखा व्यवहार हमें ऐसे खुबसूरत कवर में लपेट कर दिखाते है जो हमें बहुत आकर्षित करता है …और उसी के अंधे अनुयायी बनकर हम अपने को तबाह करते जा रहे है ….. आगे सिर्फ … अराजकता .. मानवीय संबंधो से भावना का स्थान भूख ले लेगी …

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 26, 2010

    प्रिय निखिल जी बहुत ही अच्‍छी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। क्‍योंकि आप ने इस विषय में इतना कुछ कह दिया कि अब मेरे पास आगे कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं। -दीपकजोशी63

chaatak के द्वारा
October 25, 2010

स्नेही दीपक जी, काफी दिनों बाद आपकी पोस्ट आई लेकिन एक सही मुद्दे को सही तरीके से उठाया है आपने| आपकी चिंता सही है और आपकी निराशा भी जायज है| लिव-इन-रिलेशन की आवश्यकता हमारे समाज को कभी भी नहीं थी न आज है| ये आवश्यकता है आज के नवधनाड्य वर्ग की और नौकरशाहों की जिन्हें अपनी कुत्सित वासनाओं को पूरा करने में जब बाधा नज़र आई तो ये नया कानून सामने ले आये जिससे ये स्त्री वर्ग का मनमाना शोषण कर सकें| अभी तक रेप जैसे मामलों में ८० से ९० प्रतिशत मामलों का निपटारा पीडिता को धन और बल से धमका के लोग बच जाते थे लेकिन फिर भी १० से २० प्रतिशत लोगों को सजा मिल जाती थी परन्तु अब इस क़ानून के सहारे १०० फीसदी अपराधी बाइज्ज़त समाज में घूमेंगे और नए शिकार की तलाश करेंगे| कम से कम मुझे तो इस क़ानून के पीछे यही नज़र आ रहा हैं| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 26, 2010

    प्रिय चातक जी, मै तो यही इसी ब्‍लाग पर था किन्‍तु शायद आप ही कही अंर्तध्‍यान हो गए थे। हम तो दायरे से निकल कर विषय को खोजते हुए अपने भविष्‍यफल में मग्‍न थे और फिर भी आप के आने की आस लगाए बैठे रहे। चलिये आज हमे भी आप की प्रतिक्रिया प्राप्‍त हो ही गई। इस के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

R K KHURANA के द्वारा
October 25, 2010

प्रिय दीपक जी, आपका कहना सत्य है ! इस प्रकार से तो समाज का रूप बदतर होता जायगा ! मर्यादा नाम की कोई चीज़ ही नहीं रह जायगी ! जो की सभ्य समाज को विकृत कर देगा ! राम कृष्ण खुराना

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 26, 2010

    आदरणीय खुराना जी, प्रणाम, अब बला गले पड़ ही गई है तो झेलना तो पड़ेगा किन्‍तु आगे आने वाले कल से भी बहुत डर लगता है। क्‍योंकि आज यह तो कल न जाने क्‍या-क्‍या। -दीपकजोशी63

nishamittal के द्वारा
October 25, 2010

सच कहा दीपक जी,कुछ तो पाश्चात्य अन्धानुकरण ऊपर से न्यायलय का ऐसा` फैसला .वैसे सो समाज में आधुनिकता के नाम, पर हमारे समाज की परम्पराओं के विरुद्ध न जाने क्या क्या अनुचित हो रहा है.परन्तु सच में आगामी समय की सोच तो रोंगटे खड़ा`करने वाली है.सबको सन्मति दे भगवन.

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 25, 2010

    आदरणीय निशा जी, प्रणाम, आप ने सही ही कहा है पाश्‍चात्‍य अन्‍धानुकरण या आधुनिकरण की दौड़ मे हम कही न कहीं अपनी संस्‍कृती एवं सभ्‍यता को भुलते या खोते जा रहे है। और अभी हमने इस से आगे और भी बहुत कुछ देखना एवं झेलना पड़ेगा। किन्‍तु यह समय का चक्र है कही तो रूकेगा उस का इंतजार है। धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

abodhbaalak के द्वारा
October 25, 2010

दीपक जी नमस्कार, आपने जिस आगे क्या है का प्रशन उठाया है वो अत्यंत भयावह है, आने वाले कल में क्या होता है वो तो आज के वातावरण को देख कर ही अंदाजा लगाया जा सकता है. अब तो क़ानून भी ऐसे बेशर्म रिश्तों को मान्यता देने लगा है, कल की परिकल्पना वास्तव में ….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    October 25, 2010

    प्रिय अबोध जी, नमस्‍कार, इब्‍तदाए इश्‍क है रोता है क्‍या आगे-आगे देखीये होता है क्‍या। यह नए जमाने ने आप को यानी समाज को भी इस को मानने के लिए घुटने टेक ही दिए है और उच्‍चतम न्‍यायालय को भी इस के पक्ष में बोलने के लिए जब बाध्‍य किया तो आगे भी इस नए जमाने की नई रीत को अपनाने के लिए क्‍यों न पहले से ही तैयार हो जाए। -दीपकजोशी63


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