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बातें जो रह गई याद

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हमारी परंपराएं

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मेरी एक 7 वर्ष की बेटी है। वह एक कॉन्‍वेंट स्‍कूल में दूसरी कक्षा में पढती है। आज वह जब स्‍कूल से लौटी तो उस की कापी जांचते समय उस में लिखे एक पन्‍ने पर नजर पड़ी। स्‍कूल में मैडम ने दशहरा पर पांच वाक्‍य बनाने को बोला था उस ने जो वाक्‍य लिखे वह इस प्रकार थे -

1.     दशहरा में तीन पुतलियां होती हैं।

2.    दशहरा में लोग पापड़ी-चाट खाते है।

3.    दशहरा मेले में बनाया जाता है।

4.    दशहरा में राम रावण को हरा देते है।

5.    दशहरा में पटाखे और दीपक जलाते हैं।

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      इन पांच लाईनों में आप आज के बच्‍चों के मस्‍तिष्‍क को पढ़ सकते है, कि इन त्‍यौहारों कि परंपराएं आज लुप्‍त होती नजर आ रही है। उस का कारण है कि वह (आज के बच्‍चे) यह सब अब नहीं देख पा रहे है! आज के परिवेश में बड़े शहरों में राम-लीलाओं का मंचन, एवं रावण दहन आदि तो एक तरह से पुरानी धूल-धूसरित किताबों से मट्टी की परतें हटाने वाली बातें लगती है। कारण बढती आबादी, बढ़ता शहरीकरण, खुले मैदान एवं पार्को का अभाव, और सब से ज्‍यादा डर आतंकवादी गतिविधियों का, वह डर जिस के चलते लोग भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से डरते हैं।

 

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      आज के बच्‍चों को रामायण की पुरी कहानी का ही पता नहीं होगा। हमारे बचपन में हम लोगों के घरों के आस-पास कहीं न कहीं रामलीला का मंचन होता था और हम लोग परिवार वालों के साथ रात को रामलीला देखने जाते थे। हर एक दृश्‍य को बहुत गौर से देखते थे। आज कल की रामलीलाओं में वह मजा कहां, आजकल तो गिनी चुनी जगह पर रामलीलाएं होती है और वहां भी टिकट या पास के अलावा प्रवेश नहीं है, और न ही आज के बच्‍चों में रामलीला आदि देखने का रूझान है। वह तो केवल टी.वी., इन्‍टरनेट या केबल से ही जुड़े रहते है और उन्‍हे तो यह नई जमाने की ही फिल्‍म बाल हनुमान, माई फ्रेंड गनेशा ही पसंद है। आज के बच्‍चों में न तो त्‍यौहारों के लिए वह उत्‍साह है न उस से लगाव उन के लिए यह एक रूटीन है जिस को निभाना है।

 

      आज के आधुनिक माहौल में त्‍यौहारो का महत्‍व कही लुप्‍त सा होता जा रहा है। अब दीवाली पर ही देखे, आज कल एक नया ट्रेंड बन चला है कि दीवाली पर रिश्तेदारों व मित्रों के घर अब गिफ्ट पैक बांट कर आया जाता है। बाजार ने भी इस चलन को पहचान कर अब दीवाली पर ऐसे गिफ्ट पैकों की भरमार सी लगा दी है। आज कुरकुरे, बिस्‍कुट, जूस, चाकलेट आदि ने मिठाईयों को किनारे कर अपना वर्चस्‍व कायम कर लिया है। ऊपर से करेला नीम चढ़ा हो रहा है यानि मावे में मिलावट की खबरों ने मिठाई के बारे में सोच को भी मन-मस्तिष्‍क से मिटा दिया है।

 

      दीवाली से पहले धनतेरस पर नए बर्तन खरीदने की परंपरा है आज वह धीरे-धीरे अपना रास्‍ता बदलते हुए नए जमाने की ओर अग्रसर है, आज धनतेरस पर बर्तन के नाम पर नान स्‍टीक कुकर, माईक्रोवेव के बाऊल, माईक्रोवेव, वाटर प्‍यूरीफायर, और कई लोग तो टी.वी. व नया फ्रिज या नई गाड़ी भी खरीद कर ले आते है और दलील यह कि भई कुछ नया खरीदना था तो यही सही।

 

      अब त्‍यौहारों पर की जाने वाली पूजा में भी आधुनिकता की चमक आ गई है, कारण न तो लोगों के पास समय है, न अब वह सब माहौल है, और न ही वह साधन आसानी से उपलब्‍ध हैं – हमारे यहां दशहरे पर आंगन में गोबर से जमीन को लीप कर उस पर गोबर के दस पिंड के समान गोले बनाए जाते थे और उन पर तोरई के पीले फूल लगा कर उन की पूजा होती थी और पूजा के बाद जो नवरात्रों मे पूजा पर बोई गई जौ, जो तब अंकुरित हो जाती थी उस की बालियाँ और तोरई के फूलों को परिवार के सभी पुरूषों के कानों में लगा कर उन का तिलक किया जाता था। अब न तो वह चौक या आंगन बचे है, न अब ताजा या शुद्ध गोबर ही उपलब्‍ध है। तो यह प्रथा ही खत्‍म कर दी गई। आज तो नवरात्री पर पूजा के लिए गोबर के उपले भी कुम्‍हार से 5/- रू में खरीद कर लाना पड़ता है।

 

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      करवा चौथ से एक दिन पहले घर की सभी महिलाएं मिल कर करवा चौथ के लिए मठरियां बनाती थी। किन्‍तु आजकल कामकाजी महिलाएं अब बाजार से ही बनी-बनाई मठरीयां मंगा कर पूजा कर लेती है। क्‍योंकि एक दिन पहले तो उनका समय बाजार से मेंहंदी लगवाने, ब्‍यूटी पार्लर में मेकअप करवाने एवं चुडियॉ खरीदने में ही व्‍यतीत हो जाता है। यही हाल अहोई अष्‍टमी और दीपावली का भी है, पहले दीवार पर गोबर लीप कर उस में अहोई माता व स्‍याह आदि के चित्र बनाए जाते थे, दीवाली पर लक्ष्‍मी-गणेश आदि के चित्र बनाए जाते थे, किन्‍तु अब उनका स्‍थान छपे हुए कैलेंडर या पोस्‍टरों ने ले लिया है।

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      यही सब कुछ देख कर आज यह लगता है क्‍या हमारी यह पुरातन परंपराए अब खत्‍म होती जा रही है हम अब शहर वाले लोग अपनी इन पुरानी परंपराओं को पीछे छोड़ आधुनिकता में बहे चले जा रहे है।

 

हां गांवों में अभी यह सभी परंपराए कुछ हद तक जीवित हैं। कुछ पुराने लोगों के कारण कुछ गांव के माहौल एवं पारिवारिक संस्‍कारों के कारण यह रीति-रिवाज आज भी कायम है। पर पता नहीं कि कब वह भी इस शहरी चकाचौंध को देख कर लुप्‍त होने के कगार पर पहुंच जाऐ।

 

अब आप लोग क्‍या सोचते है कि क्‍या हमें अब इस धरोहर को बचाना चाहिये या समय के साथ अपने आप को ढाल लेना चाहिये ………..

 

सभी ब्‍लागर्स व मेरे इस ब्‍लॉग के सभी पाठकों व उनके परिवारजनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ।

 

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दीपकजोशी63



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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

R K KHURANA के द्वारा
November 3, 2010

प्रिय दीपक जी, हमारे पुराने ऋषियों ने को परम्पराएँ बनाई थी वो बहुत ही सार्थक थी तथा बहुत सोच समझ कर ही बनाई गयी थी ! उनका महत्त्व भी है ! परन्तु आज की पीडी इनको मानने को तैयार नहीं है ! बहुत से रीती रिवाज लुप्त होते जा रहे है ! एक अच्छा प्रयास ! राम कृष्ण खुराना

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 4, 2010

    आदरणीय खुराना साहब, देर से प्रतिक्रिया देने के लिए माफी चाहता हूं कुछ नेट में खराबी कुछ त्‍यौहार में खरीदारी एवं साफ सफाई के कारण व्‍यस्‍तता। आप ने सही ही कहा है – हमारे पुराने ऋषियों ने जो परम्पराएँ बनाई थी वो बहुत ही सार्थक थी तथा बहुत सोच समझ कर ही बनाई गयी थी ! उनका महत्त्व भी है ! हर त्‍यौहार एवं पर्व हमे एक नई शिक्षा प्रदान करता है। परन्तु आज की पीडी इनको मानने को तैयार नहीं है वह तो बस आधुनिकता की दौड़ में भागी चली जा रही है। प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद -दीपकजोशी63

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 3, 2010

आपकों व आपके पूरे परिवार को धनतेरस व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं अरविन्‍द पारीक

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 4, 2010

    प्रिय अरविन्‍द जी भाईजी व उनके पूरे परिवार को मेरी तरफ से दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं कहियेगा। -दीपकजोशी63

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 3, 2010

प्रिय श्री दीपक जोशी जी, भाईजी ने भले ही आपको शीर्षासन करवा कर विषयों पर उल्‍टा-पुल्‍टा लिखनें को कहा हो । आप तो पान की दूकान से विषय सीधे, सच्‍चे व सार्थक ढूंढ ही लाते हैं । शहर में रहकर अनेकों परंपराओं का निर्वाह होना व करना अत्‍यंत कठिन होता है । क्‍योंकि सभी रिवाजों की पूर्ति के लिए आवश्‍यक सामग्री ही नहीं मिल पाती । तथापि कुछेक बातें ऐसी है जो व्‍यवहार के संस्‍कार से जुड़ी हैं । उन्‍हें तो हम निबाह ही सकते हैं । एक बार फिर अच्‍छी पोस्‍ट के लिए बधाई ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 4, 2010

    प्रिय अरविन्‍द जी, प्रणाम, भई शीर्षासन वाली बात याद मत दिलाएं, उस दिन बहुत बुरे फंसे थे। रही बात चौरसीया जी की दुकान पर उठने वाले विषय की तो भई वहां रोज एक नया विषय सुबह जन्‍म लेता है और रात तक चलता है कई बार तो दो-दो दिन तक चलता है। आप ने सही ही कहा है कि – शहर में रहकर अनेकों परंपराओं का निर्वाह होना व करना अत्‍यंत कठिन होता है । क्‍योंकि सभी रिवाजों की पूर्ति के लिए आवश्‍यक सामग्री ही नहीं मिल पाती। और कुछ आधुनिकता की दौड़ में हम भूल जाते है या भुला देना चाहते है। प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

Ritambhara tiwari के द्वारा
November 3, 2010

आदरणीय दीपक जी! सादर प्रणाम!! यदि हमारी परम्पराएँ विलुप्त हुई हैं तो इसका कारण हम आप ही है ! हमें ही आधुनिक का जबरदस्त भूत सवार है,कहीं न कहीं हमारी ही छमता कम हुई है बच्चो को यह समझाने की कि ज़रा इधर भी ध्यान दो ! ये हमारी परंपरा है संस्कृति है ,अगर हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संवारे रखना है तो पहले स्वयं को अपनी विरासत पर गर्व करना सीखना होगा ! आजकल ज़्यादातर माता-पिता पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंगना ही अच्छा मानते है यही सोच बदलने कि ज़रूरत है.

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 4, 2010

    रीताम्‍भरा जी, प्रणाम, आप ने सही ही कहा है कि – हमें ही आधुनिक का जबरदस्त भूत सवार है,- पर इस सच्‍चाई से भी मुह नही मोड़ जा सकता की आधुनिकता की आंधी में आप स्‍वयं को रोकना भी चाहें तो रोक नहीं पाएंगे क्‍योंकि उस का वेग इतना तेज है कि हमे उस के वेग के साथ बहना ही पड़ेगा। परन्‍तु यदि हमारी सोच सही है तो हम अपनी इस धरोहर को बचा ही लेंगें। अच्‍छी प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

Alka Gupta के द्वारा
November 2, 2010

दीपक जी, आज इस आधुनिकता की दौड़ में हमने अपनी पुरानी परंपराएँ काफी पीछे छोड़ दी हैं ….. परंपराओं और भारतीय संस्कृति पर आधारित श्रेष्ठ ऱचना। 

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 3, 2010

    अलका जी, प्रणाम यह आज के बदलते हुए परिवेश की सच्‍चाई है जो हम जानते भी है किन्‍तु कह नहीं पाते है क्‍योंकि हम भी समाज और वातावरण से जुडे हुए है। हम यदि बदलना भी चाहें तो सामाजिक धारा के बहाव को काट कर अपनी दिशा चुनना बहुत ही मुशकिल है। -दीपकजोशी63

rajkamal के द्वारा
November 2, 2010

आदरणीय दीपक जी …. आप से गुजारिश है की आप स्वर्गीय रामानंद सागर की रामायण की डी.वी .डी ..अपनी बिटिया को दिखाए और फिर कौन बनेगा करोड़पति के बिग बी की तर्ज़ पर उससे रामायण से सम्बंदित सवालात पूछे …. उम्मीद करता हूँ की कम से कम आप के घर की परम्पराएँ तो कुछ हद तक मजबूत हो ही जायेंगी .. ब्लाग फीचर्ड होने के लिए दो बार मुबारकबाद … क्योंकि अगर मैं लिखता तो इसको दो भागो में ही लिखता ….

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय राजकमल जी प्रणाम, सलाह तो आप ने सही हि दि है किन्‍तु आज के इन बच्‍चों में इतनी एकाग्रता ही कहा है। दस मिनट से अधिक एक चैनल पर उन की नजर नही टिकती है। मेरी बेटी को तो मात्र कार्टून नेटवर्क या सब टी.वी; के सीरियल ज्‍यादा पसंद है। और अगर दूसरी बेटी भी साथ में बैठ कर टी.वी; देखना चाहती है तो फिर रिमोट लेने के लिए आपस में झगड़े होते है। इस कारण मैने अपने बैडरूम में अपने लिए एक अलग टी.वी; लगा रखा है। कहते हैं संस्‍कार तो परिवार में रह कर ही प्राप्‍त होते है किन्‍तु कुछ हद तक वह समाज की धारा से भी जुड़े होते है और सामाजिक धारा को बहाव इतना तेज होता है कि न चाहते हुए भी हमें उस के साथ बहना ही पड़ता है। एक अच्‍छी प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

kmmishra के द्वारा
November 2, 2010

दीपकजी प्रणाम । आपको व आपके परिवार को धनतेरस और दीपावली की शुभ कामनाएं । मिठाईयों से दूर रहियेगा और पटाखे थोड़ी दूरी से फोड़ियेगा । आभार ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय मिश्रा जी, प्रणाम, भाई साहब आप की शुभकामनाएं आज सुबह-सुबह ही प्राप्‍त हुई है, जिस के लिए आप को धन्‍यवाद। रही बात मिठाईयों कि तो र्भाइ साहब मिठे में मिलावट का डर और पटाखों में धुऐं का जहर करे तो क्‍या करें। -दीपकजोशी63

abodhbaalak के द्वारा
November 2, 2010

दीपक जी, सर्वप्रथम तो आपको और आपके परिवार के हर सदस्य को दीपावली की बधाई, आपने आज की युग के हर त्योहारों के आधुकीकरण को बड़ी ही सुन्दरता के साथ प्रस्तुत किया है, वास्तव में आज हम सब त्योहारों के असल रंग को कहीं खो चुके हैं, अब तो परम्परा रीत रिवाज आदि सब नाम के लिए ही रह गयी हैं, सुन्दर लेख, सदा की भाँती, बधाई हो

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय अबोध बालक जी, भई आप की तारिफ जितनी भी कि जाए कम है क्‍योंकि मैं इधर कई दिनों से अपने कई ब्‍लॉगरों के लेखों पर समय से प्रतिक्रिया दे नहीं पा रहा हूं पर आप मुसतेदी से हर एक के लेख को एक तो पुरा पढ़ते है और उस पर तर्क संगत प्रतिक्रिया भी देते है। जो कि काबिले तारिफ है। इस लेख के विषय पर बहुत ही अच्‍छी प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद।

आर.एन. शाही के द्वारा
November 2, 2010

दीपक भाई सर्वप्रथम आपको दीपावली की ढेर सारी बधाइयां व शुभकामनाएं । आपने नई पीढ़ी, खास कर आजके बच्चों के दिमाग में हमारे त्योहारों की रूपरेखा के विषय में जो इमेज है, उसका बखूबी वर्णन किया है । यह सही है कि ग्रामीण और कस्बाई भारत में आज भी त्योहारों की पुरानी झलक देखने को मिलती है, परन्तु पुराने दिनों के अनुभवों के आधार पर यही कहा जाएगा कि वहां भी झलक भर ही बाक़ी है । कम से कम त्योहारों के पीछे की पवित्र और स्वाभाविक उल्लासमयी भावनाओं का तो लोप होता ही जा रहा है । एक परम्परा का निर्वहन भर हो रहा है, चाहे होली हो, दीवाली हो, या दशहरा । होली अब उल्लसमयी हुड़दंग की बजाय आक्रामक हुड़दंग में बदल गई है । नई पीढ़ी की संस्कारविहीनता के कारण लोग उनसे बचकर निकलना पसंद करते हैं । भंग की तरंग वाली सात्विकता की जगह शराब के भभके ने ले लिया । खानपान भी बदल चुका है । दीपावली महंगे पटाखों पर पैसे के अपव्यय, प्रदर्शन और जुआरियों की शगल में बदल चुकी है तथा दशहरे का तो दिल्ली को छोड़कर दूसरे महानगरों में पता ही नहीं चलता । बच्चों को हम सुरक्षा कारणों से खुद सिमटकर जीने को बाध्य कर चुके हैं, तो उन्हें यदि त्योहारों के विषय में कुछ नहीं पता तो इसमें उनका कोई दोष भी नहीं है । हमें बच्चों के प्रति अदृश्य आतंकवादियों, हमारे निजी शत्रुओं तथा अज्ञात अपहरणकर्त्ताओं का भय हमेशा सताता रहता है । आजका माहौल ही ऐसा है । साधुवाद ।

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 3, 2010

    आदरणीय शाही जी प्रणाम, आप जैसे बड़े भाईयों आ आशिर्वाद एवं दिशा निर्देश हमें सदा प्राप्‍त होता रहे इसे से ज्‍यादा और प्रभु से कुछ भी नहीं चाहत है। हम तो मानव जात है किन्‍तु भगवान को भी हर युग में अपने रूप बदल बदल कर आना ही पडा क्‍योंकि वह भी समय की ही मांग थी। जी हॉं सड़क पर किचड पडा है तो क्‍या थोडि सावधानी से यदि चलें तो हम उन के छिटों से बच कर अपने गन्‍तवय पर पहुंच ही जाएंगे। प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

parveensharma के द्वारा
November 2, 2010

जोशी जी लुप्त होती विरासत पर एक अच्छा लेख. वास्तव में यह चिंतनीय है और विचारणीय भी. आजकल के बच्चे बेटमेन, सुपरमेन के बारे में ज्यादा जानते हैं. राम के बारे में नहीं. ऐसे में माता-पिता और घर के अन्य सदस्यों का ये कर्तव्य है कि वे नई पीढ़ी को अपने गौरवमयी अतीत की जानकारी दें. भारतीय संस्कृति महान है और हर भारतीय में इस संस्कृति का समावेश होना आवश्यक है. तीज-त्योहारों की परम्पराओं का जिक्र करने के लिए साधुवाद.

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 4, 2010

    प्रिय प्रवीन जी, प्रणाम, भई आप ने सही ही कहा है – माता-पिता और घर के अन्य सदस्यों का ये कर्तव्य है कि वे नई पीढ़ी को अपने गौरवमयी अतीत की जानकारी दें. भारतीय संस्कृति महान है और हर भारतीय में इस संस्कृति का समावेश होना आवश्यक है। विश्‍व में भारत ही एक देश है जिस में हर अलग अलग प्रांत में तीज-त्‍योहारो का आयोजन होता रहता है और कुछ त्‍योहार तो ऐसे है जिन में जनमानस सामूहिक रूप से भाग लेता है इस के पीछे इसे शुरू करने का कारण भी शायद यही होगा कि परिवार एवं समाज आपस में मिल जुल कर रहें। जैसे होली और ईद। प्रतिक्रिया देने के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 2, 2010

आदरणीय दीपक जी………. बहुत ख़ूबसूरती से आपने लुप्त होती परम्पराओं का वर्णन किया है…. इस और अगर ध्यान नहीं दिया गया तो कुछ समय में ये केवल किताबों और कहानियों तक ही सीमित न रह जाएँ….. बहुत हद तक कुछ ऐसे ही विषय पर लेख मैंने भी तैयार किया है……….. पर उत्कृष्टता और पोस्ट करने में आप बाजी मार ले गए… उत्कृष्ट लेख के लिए बधाई………..

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय पियूष जी, प्रणाम, भई विचार अपने-अपने मत अपना-अपना, हम तो रमता जोगी है जो मन में आ गया वह लिख दिया। ब्‍लॉग का नाम भी इसी लिए यही दिया है बाते सब के साथ जो रह गयी याद। तो भाई अपने विचार मन में न रखें, उन्‍हें ब्‍लॉग पर उडेंल दे अर्थात मंच पर पाठकों के बीच व्‍यक्‍त करें उत्‍कृष्‍ठता का पारितोषक तो पाठक स्‍वयं ही देगें।

nishamittal के द्वारा
November 2, 2010

दीपक जी,परम्पराएँ तो तथाकथित आधुनिकता के चलते उपहास उड़ाने के लिए रह गयीं हैं.रामलीला के स्तर में आज इतनी गिरावट आ गयी है कि यदि आप एक बार जायेंगे तो अगली बार \लड़कियों को स्वयं ही नहीं ले जायेंगे.कहावत है .माहौल बिगाड़ने वाले भी हमारे भाई बंधू हैं.दीपावली आदि त्योहारों पर गिफ्टपैक आदि बाज़ार की दें है जिसमें हम आप सब खो रहे हैं.

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    November 3, 2010

    आदरणीय निशा जी, प्रणाम आप ने सही  हि कहा है – तथाकथित आधुनिकता के चलते उपहास उड़ाने के लिए रह गयीं हैं. अब हमारी बची खुची परंपराएं और रामलीलाओं के स्तर में आज इतनी गिरावट आ गयी है जो सादगी पहले थी वह अब लुप्‍त सी हो गई है। प्रितिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। -दीपकजोशी63


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